अध्याय 2 · श्लोक 47— सांख्य योग
Read this verse in English →गीता का सबसे उद्धृत श्लोक — निष्काम-कर्म का स्रोत: कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं।
चिंता, प्रदर्शन-दबाव, थकावट, और उन स्थितियों के लिए जहाँ परिणाम की आसक्ति कर्ता को थका रही हो।
भगवद्गीता 2.47 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। सामने आया काम पूरे मन से करो, फल पर पकड़ छोड़ दो, और दूसरी ओर झुककर कर्म छोड़ भी मत दो।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
पारंपरिक भाष्य-वाचन
प्रत्येक भाष्य-परम्परा इस श्लोक को कैसे पढ़ती है — एक पंक्ति में।
अद्वैत — शंकराचार्य परम्पराविहित कर्म करो पर फल के कर्तृत्व का दावा मत करो; 'मैं कर्ता हूँ' का भाव त्यागो, और अकर्म भी अस्वीकार्य है।
— शंकराचार्य, भगवद्गीता-भाष्य
विशिष्टाद्वैत — रामानुजाचार्य परम्परापूर्ण प्रयास से कर्म करो पर फल भगवान को अर्पित कर दो; वह अर्पण, कर्म का त्याग नहीं, मुक्ति देता है।
— रामानुजाचार्य, गीता-भाष्य
भक्ति / गौड़ीय — प्रभुपाद परम्पराअपने विहित कर्तव्य के रूप में कृष्ण-भावनामृत में कर्म करो; फल का त्याग अर्थ है परिणाम उन्हें अर्पित करना, कर्म रोकना नहीं।
— प्रभुपाद, भगवद्गीता यथारूप
लिप्यंतरण
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi
शब्दार्थ (अन्वय)
- कर्मणि एव
- — कर्म में ही
- अधिकारः ते
- — तेरा अधिकार है
- मा फलेषु कदाचन
- — फलों में कभी नहीं
- मा कर्मफलहेतुः भूः
- — फल का हेतु मत बन
- मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि
- — तेरी आसक्ति अकर्म में न हो
भावार्थ
तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। कर्म के फल का हेतु मत बन, और न ही अकर्म में तेरी आसक्ति हो।
व्याख्या
यह सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक और कर्मयोग का मूल हृदय है। एक ही पंक्ति में श्रीकृष्ण उस दुविधा को सुलझा देते हैं जिसने अर्जुन को — और परिणाम से डरने वाले प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को — जकड़ रखा है। श्रीकृष्ण एक स्पष्ट सीमारेखा खींचते हैं। वे कहते हैं — कुछ बातें तुम्हारे अधिकार में हैं और कुछ नहीं। कर्म चुनना, प्रयास करना, सही भाव से करना और अभी आरम्भ करना — यह तुम्हारे हाथ में है। फल, फल का समय, प्रयास और पुरस्कार का अनुपात, तथा संसार का निर्णय — यह तुम्हारे हाथ में नहीं। जिसे हम तनाव कहते हैं वह प्रायः मन का इसी रेखा को लाँघकर उन बातों को नियंत्रित करने का प्रयास है जो कभी हमारी थीं ही नहीं। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण क्या नहीं कहते। वे कर्म त्यागने को नहीं कहते — अगले ही चरण में 'अकर्म में आसक्ति न हो' कहकर इसका निषेध करते हैं। वे गुणवत्ता के प्रति लापरवाही को भी नहीं कहते — कर्मयोग उत्कृष्टता माँगता है, क्योंकि अधूरे मन का कर्म स्वयं आराम की एक आसक्ति है। और वे परिणाम के प्रति ठंडे या उदासीन रहने को भी नहीं कहते। वे जिसका त्याग कहते हैं वह है फल की उग्र, लालसामयी पराधीनता — वह 'यदि यह असफल हुआ तो मैं सह न सकूँगा' का भाव जो कर्म को ही दूषित कर देता है। आदि शंकराचार्य 'मा कर्मफलहेतुर्भूः' का अर्थ करते हैं — फल से प्रेरित होकर कर्म का हेतु मत बनो; क्योंकि वह लालसा भय, छल और निराशा को जन्म देती है। स्वामी चिन्मयानन्द धनुर्धर का उदाहरण देते हैं: बाण छूट जाने पर कोई चिंता उसे मोड़ नहीं सकती; धनुर्धर की समस्त कला लक्ष्य साधने और छोड़ने के क्षण में है, उड़ान को चिंता से देखने में नहीं। गीता प्रेस बल देती है कि यह भाग्यवाद नहीं, उसका विपरीत है — यह उस ऊर्जा को मुक्त कर देता है जिसे चिंता खा जाती है और उसे पुनः कर्म में लगा देता है। चारों चरण मिलकर एक पूर्ण साधना बनाते हैं: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' — तेरा अधिकार कर्म में है; 'मा फलेषु कदाचन' — फलों में कभी नहीं; 'मा कर्मफलहेतुर्भूः' — फल से प्रेरित मत हो; 'मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि' — फिर भी वैराग्य के नाम पर आलस्य के दूसरे छोर पर मत झूल जा। ये मिलकर उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो पूर्ण समर्पण से कर्म करता है और तनिक भी आसक्ति नहीं रखता।
भगवद्गीता 2.47 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
परिणाम और मेट्रिक्स से ग्रस्त संसार में यह श्लोक क्रांतिकारी है: अपने कर्म को अच्छा करने पर ध्यान दो, अंक की चिंता में मत डूबो। यह परफॉर्मेंस एंग्जायटी और बर्नआउट का मूल उपचार है — अपना सर्वश्रेष्ठ दो, फिर छोड़ दो। विचार करें कि हमारा कितना दुःख पूर्व-दुःख है: परिणाम आने से पहले ही असफलता का अभ्यास, बार-बार इनबॉक्स देखना, साक्षात्कार को मन में दोहराना। वह मानसिक ऊर्जा वर्तमान से उधार ली जाती है — जहाँ वास्तविक कर्म है — और एक ऐसे भविष्य पर खर्च होती है जो हमारे वश में नहीं। श्रीकृष्ण का उपदेश उसे पुनः लौटा देता है। वैराग्य महत्वाकांक्षा का ह्रास नहीं, बल्कि उस एकमात्र क्षण पर अखंड ध्यान है जहाँ उत्कृष्टता जन्म लेती है: अभी।
भगवद्गीता 2.47 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
इसे 'जो तुम्हारे वश में है उसी पर ध्यान दो' वाली सोच समझो। तुम यह नियंत्रित नहीं कर सकते कि नौकरी मिलेगी या नहीं, नंबर कितने आएँगे, कितने लाइक मिलेंगे, या क्रश रिप्लाई करेगा या नहीं — पर अपनी तैयारी, मेहनत और रवैये की गुणवत्ता पूरी तरह तुम्हारे हाथ में है। इसलिए जो हिस्सा तुम्हारा है उसमें सब कुछ झोंक दो, और स्कोरबोर्ड को दिमाग में मुफ्त में मत बसने दो। यही तुलना-संस्कृति का इलाज भी है: जब तुम्हारा मूल्य तुम्हारी मेहनत से जुड़ा हो, परिणाम या एल्गोरिद्म से नहीं, तो बाहरी वैलिडेशन की ज़रूरत खत्म हो जाती है। काम करो क्योंकि वह तुम्हारा है। परिणाम अपने आप सम्हल जाएँगे — और शांति दोनों हाल में तुम्हारे पास रहेगी।
भगवद्गीता 2.47 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कहते हैं: अपना काम पूरे मन से करो, पर इनाम की चिंता में मत डूबो। यदि तुम सीखने के प्रेम से पढ़ो — सिर्फ अंकों के लिए नहीं — तो ज्यादा खुश रहोगे और बेहतर भी करोगे।
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 2.47 का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि तुम्हारे वश में तुम्हारा प्रयत्न है, फल नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मन लगाकर कर्म करो और फल को छोड़ दो — न केवल फल के लिए काम करो, न असफलता के डर से कर्म त्यागो। यही कर्मयोग का बीज है: पूरा प्रयत्न, कोई आसक्ति नहीं।
यह श्लोक किसने और कहाँ कहा?
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर अर्जुन से, दूसरे अध्याय (सांख्य योग) में कहा, जब वे अर्जुन के विषाद का उत्तर दे रहे थे।
'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का अर्थ क्या है?
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” का अर्थ है “तेरा अधिकार केवल कर्म में है।” यही श्लोक का आरम्भ है और श्रीकृष्ण की इसी बात की नींव रखता है कि हमारा अधिकार करने पर है, उससे मिलने वाले फल पर नहीं।
गीता 2.47 आज के जीवन में कैसे उतारें?
जो काम सामने है — परीक्षा, नौकरी, रिश्ता — उसमें पूरा मन लगाओ और हर समय फल का हिसाब लगाना छोड़ दो। लक्ष्य ऊँचा रखो, पर परिणाम को अपनी शांति का स्वामी मत बनने दो। यही बदलाव मन को स्थिर करता है और प्रायः काम को भी बेहतर बना देता है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण उपदेश आरंभ करते हैं — आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, क्षत्रिय के धर्म और निष्काम कर्मयोग का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए हैं।
अध्याय पढ़ें →इन विषयों में शामिल
✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 2.47 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 2.47 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →