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अध्याय 5 · श्लोक 29कर्म संन्यास योग

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श्लोक 29 / 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

लिप्यंतरण

bhoktāraṁ yajña-tapasāṁ sarva-loka-maheśhvaram suhṛidaṁ sarva-bhūtānāṁ jñātvā māṁ śhāntim ṛichchhati

शब्दार्थ (अन्वय)

bhoktāram
the enjoyer
yajña
sacrifices
tapasām
austerities
sarva-loka
of all worlds
mahā-īśhvaram
the Supreme Lord
su-hṛidam
the selfless Friend
sarva
of all
bhūtānām
the living beings
jñātvā
having realized
mām
me (Lord Krishna)
śhāntim
peace
ṛichchhati
attains

भावार्थ

भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या

"भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्, सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।" — मुझे सब यज्ञ और तपस्याओं का भोक्ता, सब लोकों का महेश्वर, सब प्राणियों का सुहृद जानकर — शान्ति पाता है। यह अध्याय 5 का समापन श्लोक है, और गीता में सबसे प्रिय में से एक है। कर्म योग और ज्ञान से प्रभुत्व वाले अध्याय के बाद, श्रीकृष्ण एक भक्तिपूर्ण समर्पण के साथ समाप्त करते हैं। तीन पहचानें: (1) 'भोक्तारं यज्ञतपसाम्' — सब यज्ञ और तपस का भोक्ता। (2) 'सर्वलोकमहेश्वरम्' — सब लोकों का महेश्वर। (3) 'सुहृदं सर्वभूतानाम्' — सब प्राणियों का सुहृद। शंकराचार्य बताते हैं कि इन तीन चीज़ों को जानना — केवल विश्वास नहीं बल्कि वास्तव में पहचानना — 'शान्तिमृच्छति,' शान्ति मिलती है। यह कर्म-ज्ञान उपदेश का भक्ति-पूर्णन है।

भगवद्गीता 5.29 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

अध्याय जो अर्जुन के प्रश्न से शुरू हुआ — कौन सा पथ बेहतर है — एक पहचान के साथ समाप्त होता है जो सब पथ समाहित करती है: जो भी करो, उसे उस एक को समर्पित करो जो सब समर्पण का भोक्ता है; जो भी खोजो, जानो कि इसका परम आधार वह महेश्वर है; और जो भी भय हो, जानो कि ब्रह्माण्ड धारण करने वाला भी तुम्हारा सुहृद है। यह त्रि-गुण पहचान — कि तुम्हारा प्रयास ग्रहण किया जाता है, कि ब्रह्माण्ड शासित है, और एक मित्र द्वारा — वह नींव है जिसकी ओर श्रीकृष्ण पूरे अध्याय में इशारा कर रहे हैं।

भगवद्गीता 5.29 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

अध्याय 5 का समापन श्लोक बेसिकली श्रीकृष्ण का यह कहना है: सब कुछ यहाँ अभिसरित होता है। मुझे सब प्रयास का परम प्राप्तकर्ता (हर परम्परा में हर यज्ञ), सब लोकों का प्रभु (उनके क्षेत्र के बाहर कुछ नहीं), और सब प्राणियों का मित्र (न्यायाधीश नहीं, मित्र) जानो। तीन पहचानें → शान्ति।

भगवद्गीता 5.29 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

अध्याय 5 का सुंदर अंत: श्रीकृष्ण कहते हैं — मेरे बारे में ये तीन चीज़ें जानो और शान्ति मिलेगी! एक: मैं तुम्हारे सभी ईमानदार प्रयास और प्रार्थनाएँ ग्रहण करता हूँ — कुछ भी व्यर्थ नहीं। दो: मैं हर लोक और सब प्रकृति का प्रभु हूँ। तीन: मैं हर प्राणी का मित्र हूँ, तुम्हारा भी। जब तुम सच में ये तीन चीज़ें जानते हो, हृदय में गहरी शान्ति भर जाती है!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

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