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अध्याय 6 · श्लोक 1आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 1 / 47

श्री भगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥

लिप्यंतरण

śhrī bhagavān uvācha anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

śhrī-bhagavān uvācha
the Supreme Lord said
anāśhritaḥ
not desiring
karma-phalam
results of actions
kāryam
obligatory
karma
work
karoti
perform
yaḥ
one who
saḥ
that person
sanyāsī
in the renounced order
cha
and
yogī
yogi
cha
and
na
not
niḥ
without
agniḥ
fire
na
not
cha
also
akriyaḥ
without activity

भावार्थ

श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

व्याख्या

"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः, स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।" — जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है, न कि वह जो अग्नि नहीं जलाता और कर्म नहीं करता। श्रीकृष्ण अध्याय 6 की शुरुआत संन्यास की उस पुनर्परिभाषा को पूरा करके करते हैं जो अध्याय 5 में शुरू हुई थी। वे एक लोकप्रिय भ्रांति को सीधे सुधारते हैं: कि संन्यास का अर्थ सब गतिविधि छोड़ना है। सच्चा संन्यासी वह है जो कार्य करता है — पर फल का आश्रय लिए बिना (अनाश्रितः कर्मफलम्)। शंकराचार्य 'कार्यं कर्म' वाक्यांश पर बल देते हैं — वह कर्म जो करना चाहिए, अनिवार्य कर्तव्य। ऐसा कर्म इसलिए किया जाता है क्योंकि यह सही है, न कि इसलिए कि यह क्या देगा। परिणामों पर यह आंतरिक अनाश्रय ही संन्यास का सार है। दूसरा भाग तीखा है: 'न निरग्निर्न चाक्रियः' — केवल अग्नि छोड़ने वाला या निष्क्रिय हो जाने वाला नहीं। केवल बाहरी निवृत्ति किसी को योगी नहीं बनाती।

भगवद्गीता 6.1 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

हम आध्यात्मिकता को पीछे हटने के बराबर मानते हैं — छोड़ना, निवृत्त होना, कम करना। श्रीकृष्ण इसे पलट देते हैं: वास्तविक संन्यासी आवश्यक कार्य में पूरी तरह संलग्न है पर परिणामों पर निर्भरता से आंतरिक रूप से मुक्त है। तुम एक समर्पित पेशेवर, माता-पिता या छात्र हो सकते हो और सच्चे अर्थ में 'योगी' हो सकते हो, बशर्ते तुम्हारी आंतरिक शांति परिणाम पर टिकी न हो। परीक्षा आंतरिक है, बाहरी नहीं।

भगवद्गीता 6.1 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

प्लॉट ट्विस्ट: असली 'साधु' वह नहीं जो सब छोड़कर कुछ नहीं करता। यह वह व्यक्ति है जो अपने काम में पूरी तरह शो-अप करता है पर चुपके से रिज़ल्ट का आदी नहीं है। तुम अपने गोल्स पर हार्ड ग्राइंड कर सकते हो और योगी भी हो सकते हो — कैच यह है कि तुम्हारी पीस आउटकम पर डिपेंड नहीं कर सकती। बस ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर अंदर क्रेविंग रखना? वह त्याग नहीं, अवॉइडेंस है।

भगवद्गीता 6.1 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कहते हैं सच्चा पवित्र व्यक्ति वह नहीं जो सब काम छोड़कर बैठ जाए। यह वह है जो अपने कर्तव्य पूरे मन से करता है पर इनाम के लिए परेशान नहीं होता। तुम अपने काम कर सकते हो, पढ़ सकते हो, दूसरों की मदद कर सकते हो — और फिर भी 'योगी' हो सकते हो — बशर्ते तुम शांत, देने वाले मन से करो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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