अध्याय 5 · श्लोक 28— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →गीता 5.28 — askgita पर Gita Verses on Moksha, Liberation and Enlightenment पर पाठों में उद्धृत।
गीता 5.28 उस अभ्यास का फल बताती है: जिस मुनि की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि साधे हैं, जिसमें कामना, भय और क्रोध नहीं, जो मुक्ति का प्रयत्न करता है — वह पहले से सच्चे रूप में मुक्त है। मुक्ति आसन पर ही आरम्भ हो जाती है, पूरी होने से पहले।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
लिप्यंतरण
yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ vigatecchā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- yata
- — controlled
- indriya
- — senses
- manaḥ
- — mind
- buddhiḥ
- — intelligence
- muniḥ
- — the transcendentalist
- mokṣa
- — liberation
- parāyaṇaḥ
- — being so destined
- vigata
- — discarded
- icchā
- — wishes
- bhaya
- — fear
- krodhaḥ
- — anger
- yaḥ
- — one who
- sadā
- — always
- muktaḥ
- — liberated
- eva
- — certainly
- saḥ
- — he is
भावार्थ
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
व्याख्या
"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः, विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।" — जिसने इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि वश में किए, मोक्षपरायण मुनि, जिससे इच्छा, भय और क्रोध चले गए — वह सदा मुक्त ही है। यह श्लोक 5.27 में शुरू हुए ध्यान-क्रम को पूरा करता है। भौतिक तकनीकें उस आंतरिक अवस्था में अभिसरित होती हैं जो वे विकसित करती हैं। नया तत्त्व है 'भय' (भय), इच्छा और क्रोध के साथ त्रिकोण पूरा करता है। शंकराचार्य बताते हैं कि भय संरचनात्मक रूप से संभावित हानि की प्रतिक्रिया है। तीनों — इच्छा, भय, क्रोध — अहंकार-प्रतिक्रियात्मकता का त्रिकोणीय ढाँचा बनाते हैं। 'सदा मुक्त एव सः' — वह सदा मुक्त ही है। 'सदा' (हमेशा) और 'एव' (सच में) मिलकर एक मज़बूत दावा करते हैं: मुक्ति रुक-रुककर नहीं। वह कोई अवस्था नहीं जो आती-जाती है।
भगवद्गीता 5.28 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
इच्छा, भय और क्रोध की त्रिकोणी पीड़ा के मूल चालकों के रूप में गीता के सबसे मनोवैज्ञानिक रूप से सटीक सूत्रों में से एक है। आधुनिक अटैचमेंट सिद्धांत इस पर मेल खाता है: चिंतित/परिहारी पैटर्न जो अधिकांश संबंधपरक पीड़ा चलाते हैं आसक्ति (इच्छा) और उसके धमकाए गए हानि (भय → क्रोध) में जड़े हैं।
भगवद्गीता 5.28 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
भगवद्गीता 5.28 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
जब कोई अपनी इन्द्रियाँ, मन और सोच नियंत्रित करता है, और इच्छा, भय और क्रोध छोड़ देता है — वह हमेशा मुक्त है! केवल कभी-कभी नहीं, केवल तब नहीं जब सब ठीक हो, बल्कि हमेशा। यह उस पक्षी की तरह है जिसके पंख हैं — जब भी आराम कर रहा हो, हमेशा उड़ने के लिए स्वतंत्र। स्वतंत्रता हमेशा है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 5.28 का अर्थ क्या है?
जिस मुनि की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि साधे हैं, जिसमें कामना, भय और क्रोध नहीं, जो मुक्ति का प्रयत्न करता है — वह पहले से सच्चे रूप में मुक्त है। मुक्ति आसन पर ही आरम्भ हो जाती है, पूरी होने से पहले।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, पाँचवें अध्याय (कर्म संन्यास योग) में, ध्यानी की स्वतंत्रता पर।
गीता 5.28 आज के जीवन में कैसे उतारें?
अधूरा भी अभ्यास, जो भय, लालसा और क्रोध को कम करे, स्वयं एक प्रकार की स्वतंत्रता है। भीतरी अनुशासन की हर सीढ़ी लक्ष्य का थोड़ा स्वाद देती है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 5.28 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 5.28 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →