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अध्याय 9 · श्लोक 24राजविद्या राजगुह्य योग

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श्लोक 24 / 34

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥

लिप्यंतरण

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

शब्दार्थ (अन्वय)

aham
I
hi
verily
sarva
of all
yajñānām
sacrifices
bhoktā
the enjoyer
cha
and
prabhuḥ
the Lord
eva
only
cha
and
na
not
tu
but
mām
me
abhijānanti
realize
tattvena
divine nature
ataḥ
therefore
chyavanti
fall down (wander in samsara)
te
they

भावार्थ

क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ; परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है।

व्याख्या

"अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च, न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।" — क्योंकि मैं सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। पर वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए वे गिरते हैं। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि 9.23 में वर्णित पूजा, यद्यपि उन तक पहुँचती है, क्यों अधूरी रहती है। 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुः एव च' — मैं सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। पर: 'न तु मां अभिजानन्ति तत्त्वेन' — वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते। 'अतः च्यवन्ति ते' — और इसलिए वे गिरते हैं — पुनर्जन्म के चक्र में लौटते हैं। शंकराचार्य अधूरी समझ का परिणाम समझाते हैं: क्योंकि ये उपासक, यद्यपि ईमानदार, एक सर्वोच्च को सब पूजा के सच्चे प्राप्तकर्ता के रूप में नहीं पहचानते, उनकी पूजा केवल सीमित फल देती है। समझ में सीमा प्राप्ति में सीमा उत्पन्न करती है। सत्य को पूर्णतः जानना पूर्णतम परिणाम का द्वार खोलता है।

भगवद्गीता 9.24 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण एक सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण बिंदु बनाते हैं: ईमानदार पूजा सम्मानित है और दिव्य तक पहुँचती है (9.23), पर तुम जो प्राप्त करते हो उसकी पूर्णता तुम्हारी समझ की पूर्णता पर निर्भर है। ऐसा नहीं कि दिव्य कुछ रोकता है — बल्कि सीमित समझ स्वाभाविक रूप से केवल सीमित लक्ष्यों का लक्ष्य रखती और पहुँचती है। व्यापक सिद्धांत: ईमानदारी मायने रखती है, पर स्पष्टता भी। अच्छे इरादे कहीं अच्छी जगह पहुँचते हैं, पर सही समझ तुम्हें आगे ले जाती है। सबसे गहरी पूर्णता ईमानदारी और स्पष्ट समझ दोनों से आती है। अच्छा सोचो, और सच में समझो भी।

भगवद्गीता 9.24 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण एक सटल पर इम्पॉर्टेंट पॉइंट बनाते हैं: सिन्सियर वर्शिप ऑनर्ड है और डिवाइन तक पहुँचती है (9.23), पर तुम जो अटेन करते हो उसकी कम्प्लीटनेस तुम्हारी अंडरस्टैंडिंग की कम्प्लीटनेस पर डिपेंड करती है। ऐसा नहीं कि डिवाइन कुछ विदहोल्ड करता है — लिमिटेड अंडरस्टैंडिंग नैचुरली केवल लिमिटेड गोल्स तक पहुँचती है। प्रिंसिपल: सिन्सियरिटी मैटर करती है, पर क्लैरिटी भी। गुड इंटेंशन्स कहीं गुड पहुँचते हैं, पर राइट अंडरस्टैंडिंग तुम्हें आगे ले जाती है। मीन वेल, AND ट्रूली अंडरस्टैंड भी।

भगवद्गीता 9.24 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ रोचक समझाते हैं: वे ही हैं जो सच में सब पूजा और भेंट प्राप्त करते हैं, चाहे वे किसी को भी अर्पित हों! पर कुछ लोग इसे पूरी तरह नहीं समझते — वे नहीं समझते कि सब पूजा एक भगवान तक पहुँचती है। क्योंकि उनकी समझ अधूरी है, वे सबसे बड़े लक्ष्य के बजाय केवल छोटे, अस्थायी पुरस्कार पाते हैं। ऐसा नहीं कि भगवान रोकते हैं — बल्कि पूरी तरह न समझने का मतलब छोटी चीज़ों का लक्ष्य रखना! सबक: एक अच्छा, ईमानदार हृदय अद्भुत है — और स्पष्ट रूप से समझना तुम्हें और आगे पहुँचने में मदद करता है!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।

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