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अध्याय 6 · श्लोक 5आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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आत्म-उत्तरदायित्व का गीता का घोषणापत्र — अपने आप को अपने से उठाओ; तुम अपने ही मित्र हो और अपने ही शत्रु।

अवसाद, आत्म-पराजयी आदतों, और किसी और के आकर बचाने की प्रतीक्षा की वृत्ति के लिए।

गीता 6.5 तुम्हारा भविष्य तुम्हारे अपने हाथों में रखती है: अपने ही प्रयत्न से स्वयं को ऊपर उठाओ, और स्वयं को कभी नीचे मत गिराओ — क्योंकि तुम अपने सबसे अच्छे मित्र हो सकते हो और अपने सबसे बड़े शत्रु भी। वही आत्मा जो तुम्हें हराती है, तुम्हें उबार भी सकती है।

श्लोक 5 / 47

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

पारंपरिक भाष्य-वाचन

प्रत्येक भाष्य-परम्परा इस श्लोक को कैसे पढ़ती है — एक पंक्ति में।

अद्वैत — शंकराचार्य परम्परा

आत्मा, शरीर-मन के साथ तादात्म्य से गिरी, विवेक-ज्ञान से ही उठाई जा सकती है — कोई और यह कार्य उसके लिए नहीं कर सकता।

शंकराचार्य, भगवद्गीता-भाष्य
विशिष्टाद्वैत — रामानुजाचार्य परम्परा

आत्मा को अपने ही मन को इंद्रिय-आसक्ति से मुक्त कर भगवान की ओर मोड़ना है; तभी मन शत्रु के बजाय मित्र बनता है।

रामानुजाचार्य, गीता-भाष्य
भक्ति / गौड़ीय — प्रभुपाद परम्परा

अपने ही मन की सहायता से कृष्ण-भावनामृत के माध्यम से स्वयं का उद्धार करना है; जो मन इस प्रकार नहीं लगा वह अपना सबसे बड़ा शत्रु है।

प्रभुपाद, भगवद्गीता यथारूप

लिप्यंतरण

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

उद्धरेत् आत्मना आत्मानं
अपने द्वारा अपना उद्धार करे
न आत्मानम् अवसादयेत्
अपने को गिराए नहीं
आत्मा एव आत्मनः बन्धुः
मन ही अपना मित्र है
आत्मा एव रिपुः आत्मनः
मन ही अपना शत्रु है

भावार्थ

मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को गिरने न दे, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।

व्याख्या

यह गीता का आत्म-उत्तरदायित्व का महान श्लोक है, और इसका व्याकरण उल्लेखनीय है: लगभग हर शब्द 'आत्मन्' (स्व) का ही रूप है। 'उद्धरेदात्मनात्मानं' — अपने द्वारा अपना उद्धार करो; 'नात्मानमवसादयेत्' — अपने को गिरने मत दो। स्व एक ही साथ उद्धारक है, उद्धार्य है, और दोनों के बीच निर्णय करने वाला भी। श्रीकृष्ण का केंद्रीय दावा है कि कोई बाहरी कर्ता तुम्हारा अनिवार्य आंतरिक कार्य नहीं कर सकता। गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, कृपा सहारा दे सकती है, पर वास्तविक उत्थान स्वयं द्वारा, अपने संयमित प्रयास से होता है। यह 18.66 जैसे शरणागति के श्लोकों के साथ सुंदर तनाव में है — और समाधान यह है कि शरणागति भी एक ऐसा कर्म है जिसे स्व को ही चुनना पड़ता है। आत्म-प्रयास और कृपा प्रतिद्वंद्वी नहीं; आत्म-प्रयास ही वह राह है जिससे कृपा को पकड़ मिलती है। फिर प्रसिद्ध दुधारी पंक्ति: 'आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः' — स्व ही स्व का मित्र है, और स्व ही स्व का शत्रु। वही मन जो संयमित होकर तुम्हारा सबसे बड़ा सहयोगी बनता है, असंयमित छोड़ दिया जाए तो तुम्हारा सबसे बड़ा विध्वंसक बन सकता है। शंकराचार्य और चिन्मयानन्द दोनों बल देते हैं कि 'उच्च स्व' (विवेक-निर्देशित संकल्प) को 'निम्न स्व' (आवेग और मूड में खिंचते मन) से मित्रता कर उसे वश में करना चाहिए। तुम्हें ऊपर उठाने या नष्ट करने की जितनी शक्ति तुम्हारे अपने मन में है उतनी तुम्हारे बाहर किसी में नहीं — इसीलिए अगला श्लोक इसी ओर मुड़ता है कि उस मन को कैसे जीता जाए।

भगवद्गीता 6.5 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

आधुनिक सेल्फ-हेल्प की किताबों के अस्तित्व से बहुत पहले गीता ने परिवर्तन की शक्ति को सीधे भीतर बताया। तुम्हारी आदतें, तुम्हारा स्वसंवाद, तुम्हारा अनुशासन, सुबह 6 बजे जब कोई नहीं देख रहा तब तुम स्वयं से कैसा बर्ताव करते हो — ये, परिस्थितियों से कहीं अधिक, तुम्हें अपना मित्र या अपना विध्वंसक बनाते हैं। विकास उसी क्षण आरम्भ होता है जब तुम दोष बाहर थोपना बंद कर उस उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हो। 'मित्र या शत्रु' का ढाँचा अधिकांश प्रेरक उद्धरणों से तीखा है। यह उस सुविधाजनक कहानी को नकारता है कि हम बस मूड, एल्गोरिद्म या दूसरों के रहमोकरम पर हैं। हाँ, वे हम पर दबाव डालते हैं — पर वही मन एकमात्र चर है जिसे हम सचमुच प्रशिक्षित कर सकते हैं। ध्यान दें श्लोक 'निम्न स्व' होने पर तुम्हें लज्जित नहीं करता; यह बस ज़ोर देता है कि उच्च स्व उसका भार सम्हाले, धैर्य से, अपने किसी उद्दंड हिस्से को पीटने के बजाय उससे मित्रता करते हुए। व्यावहारिक रूप: जो आंतरिक स्वर तुम दोहराते हो, जो मानक तुम रखते हो, छोटे दैनिक चुनाव — वहीं तुम चुपचाप तय कर रहे हो कि तुम अपना उद्धार कर रहे हो या अपने को डुबो रहे हो।

भगवद्गीता 6.5 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

यह मूल 'तुम खुद अपने मेन कैरेक्टर भी हो और अपने फाइनल बॉस भी' वाला श्लोक है। श्रीकृष्ण का पूरा मतलब: तुम्हारा आंतरिक काम करने कोई नहीं आ रहा — न कोई कोच, न कोई हैक, न सही प्लेलिस्ट। तुम खुद को, खुद से ऊपर उठाते हो। और वह पंक्ति जिसका सबको स्क्रीनशॉट लेना चाहिए: तुम्हारा मन या तो तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त है या सबसे बड़ा दुश्मन, और कौन-सा — यह तुम चुनते हो। वही दिमाग जो तुम्हें जिम, डेडलाइन, कठिन बातचीत के लिए राज़ी कर सकता है, वही तुम्हें डूम-स्पाइरल और रात 2 बजे की सेल्फ-रोस्ट में भी फँसा सकता है। फ्लेक्स यह दिखावा नहीं कि तुम्हारा कोई आलसी/चिंतित हिस्सा है ही नहीं — फ्लेक्स यह है कि उच्च तुम धीरे-धीरे उस बिखरे तुम से मित्रता कर उसे सम्हालो, बजाय उसे ड्राइव करने देने के। तुम्हारी आदतें, तुम्हारा स्वसंवाद, वे चुनाव जो कोई नहीं देखता — वही असली मैदान है। तुम अपने मूड के रहमोकरम पर नहीं हो; तुम वही हो जो उन्हें ट्रेन कर सकते हो।

भगवद्गीता 6.5 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक शक्तिशाली रहस्य बताते हैं: अच्छे निर्णय लेकर तुम अपने सबसे अच्छे मित्र बन सकते हो, या आलसी और लापरवाह बनकर अपने शत्रु। तुम्हारा बड़ा होना तुम्हारे लिए और कोई नहीं कर सकता। अच्छी खबर? अपने को ऊपर उठाने की शक्ति तुम्हारे पास है — एक बार में एक अच्छा निर्णय लेकर!

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 6.5 का अर्थ क्या है?

अपने ही आत्मा से स्वयं को ऊपर उठाओ, और स्वयं को गिरने मत दो; क्योंकि आत्मा अपना मित्र भी है और अपना शत्रु भी। श्रीकृष्ण तुम्हारे उत्थान या पतन की शक्ति तुम्हारे ही भीतर रखते हैं।

'उद्धरेदात्मनात्मानम्' का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है 'मनुष्य अपने ही आत्मा से स्वयं को ऊपर उठाए' — आत्म-निर्भरता और भीतरी ज़िम्मेदारी के इस प्रसिद्ध श्लोक का आरम्भ।

यह श्लोक किसने कहा?

भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, छठे अध्याय (ध्यान योग) में, अपना शत्रु नहीं बल्कि अपना मित्र होने पर।

गीता 6.5 आज के जीवन में कैसे उतारें?

तुम्हारा भीतरी कार्य कोई और तुम्हारे लिए नहीं कर सकता। वही मन जो तुम्हें रोकता है तुम्हें ऊपर भी उठा सकता है — जिससे आत्म-अनुशासन भार कम और स्वयं के प्रति मित्रता का कर्म अधिक बन जाता है।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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प्रामाणिक स्रोत

ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।