AskGita

अध्याय 5 · श्लोक 26कर्म संन्यास योग

Read this verse in English
श्लोक 26 / 29

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥

लिप्यंतरण

kāma-krodha-viyuktānāṁ yatīnāṁ yata-chetasām abhito brahma-nirvāṇaṁ vartate viditātmanām

शब्दार्थ (अन्वय)

kāma
desires
krodha
anger
vimuktānām
of those who are liberated
yatīnām
of the saintly persons
yata-chetasām
those self-realized persons who have subdued their mind
abhitaḥ
from every side
brahma
spiritual
nirvāṇam
liberation from material existence
vartate
exists
vidita-ātmanām
of those who are self-realized

भावार्थ

काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।

व्याख्या

"कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्, अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।" — काम और क्रोध से मुक्त, मन को वश में किए, स्व के ज्ञाता यतियों के लिए ब्रह्मनिर्वाण चारों ओर से निकट है। यह श्लोक 5.25 के साथ समानांतर वर्णन है: काम और क्रोध से मुक्त, मन को अनुशासित किए, और सीधे स्व को जानने वाले — ब्रह्मनिर्वाण को 'चारों ओर से निकट' (अभितः) पाते हैं। 'अभितः' — निकट, चारों ओर से — प्रभावशाली है। ब्रह्मनिर्वाण दूर का गंतव्य नहीं जिसके लिए लम्बी यात्रा चाहिए। जिसके पास वर्णित गुण हैं, उसके लिए यह हर जगह उपस्थित है — वे पहले से उसमें घिरे हैं।

भगवद्गीता 5.26 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

'चारों ओर से निकट' — मुक्ति रैखिक रूप से पहुँचा जाने वाला गंतव्य नहीं बल्कि जो पहले से हर जगह उपस्थित है उसकी पहचान है। जिसके लिए आत्मज्ञान के माध्यम से काम और क्रोध की बाध्यकारी पकड़ से वास्तव में मुक्ति मिली, उसके लिए पार करने को कुछ नहीं बचा। अलगाव हमेशा काल्पनिक था, वास्तविक नहीं। आध्यात्मिक साधना जो दूर था उस तक पुल नहीं बनाती; यह जो हमेशा यहाँ था उससे काल्पनिक अलगाव घोलती है।

भगवद्गीता 5.26 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

'चारों ओर से निकट' — ब्रह्मनिर्वाण उसे घेरता है जो काम और क्रोध से मुक्त है और स्व को जानता है। दूर का लक्ष्य नहीं बल्कि पहले से हर जगह उपस्थित। साधना दूर किसी चीज़ तक पुल नहीं बनाती; यह जो हमेशा था उससे काल्पनिक अलगाव घोलती है।

भगवद्गीता 5.26 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

जो काम और क्रोध से मुक्त हैं और अपने सच्चे स्व को जानते हैं, उनके लिए ब्रह्मनिर्वाण वहीं है — चारों ओर, हर तरफ से निकट! यह बिल्कुल दूर नहीं। यह ऐसे है जैसे वे पहले से परम शान्ति के कमरे में हैं — उन्हें बस अंततः ऊपर देखना है और देखना है कि यह हमेशा से था!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

अध्याय पढ़ें

इन विषयों में शामिल