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अध्याय 5 · श्लोक 25कर्म संन्यास योग

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श्लोक 25 / 29

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

लिप्यंतरण

labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

labhante
achieve
brahma-nirvāṇam
liberation from material existence
ṛiṣhayaḥ
holy persons
kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ
whose sins have been purged
chhinna
annihilated
dvaidhāḥ
doubts
yata-ātmānaḥ
whose minds are disciplined
sarva-bhūta
for all living entities
hite
in welfare work
ratāḥ
rejoice

भावार्थ

जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।

व्याख्या

"लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः, छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।" — जिन ऋषियों के कल्मष नष्ट, जिनके संशय काटे, जो यतात्मा, जो सब भूतों के हित में रत — वे ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं। ब्रह्मनिर्वाण पाने वालों के चार गुण: (1) क्षीणकल्मषाः — कल्मष नष्ट; (2) छिन्नद्वैधाः — संशय काटे; (3) यतात्मानः — आत्म-संयमी; (4) सर्वभूतहिते रताः — सब प्राणियों के हित में रत। चौथा गुण विशेष रूप से उल्लेखनीय है: सब प्राणियों का हित। ब्रह्मनिर्वाण दूसरों की चिंता से पीछे हटने का फल नहीं — यह उन्हें प्राप्त होता है जो सार्वभौमिक कल्याण में सक्रिय रूप से प्रसन्न हैं। यह ज्ञान और कर्म के गीता के एकीकरण के अनुरूप है।

भगवद्गीता 5.25 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

शुद्ध कल्मष और काटे संशय के साथ 'सब प्राणियों का हित' को उच्चतम मुक्ति की शर्त के रूप में सम्मिलित करना महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है मुक्ति एक निजी, एकाकी उपलब्धि नहीं है। सार्वभौमिक देखभाल की गुणवत्ता — वास्तव में सब प्राणियों के कल्याण में प्रसन्न होना — उस मुक्त अवस्था का हिस्सा है जो गठित करती है। यह गीता के दृष्टिकोण को स्वाभाविक रूप से सामाजिक बनाता है।

भगवद्गीता 5.25 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

देखो ब्रह्मनिर्वाण की सूची में क्या है: शुद्ध, बिना संशय, आत्म-संयमी — और सब प्राणियों के हित में रत। दूसरों की सेवा के बावजूद नहीं बल्कि उसे सम्मिलित करते हुए। उच्चतम उपलब्धि दूसरों की परवाह से पीछे हटकर नहीं मिलती; यह सक्रिय रूप से उनकी भलाई में प्रसन्नता के साथ सुसंगत है।

भगवद्गीता 5.25 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

उच्चतम शान्ति तक पहुँचने के लिए चार चीज़ें मदद करती हैं: अंदर से शुद्ध होना, संशय साफ होना, खुद पर नियंत्रण — और जब सब जीव खुश हों तो सच में परवाह करना और खुश होना! आखिरी सुंदर है: वास्तविक बुद्धि तुम्हें सबकी परवाह कराती है।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

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