अध्याय 5 · श्लोक 27— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →गीता 5.27 — askgita पर Gita Verses on Focus and Concentration, Gita Verses for Students (Exam Stress and Focus) पर पाठों में उद्धृत।
गीता 5.27 एक ध्यान-विधि देती है: बाहरी स्पर्शों को परे रखकर, दृष्टि भृकुटि के मध्य में स्थिर, नासिका के भीतर प्राण और अपान को संतुलित करते हुए — मनुष्य ध्यान में बैठ जाता है। शरीर और श्वास व्यावहारिक साधन बन जाते हैं।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
लिप्यंतरण
sparśhān kṛitvā bahir bāhyānśh chakṣhuśh chaivāntare bhruvoḥ prāṇāpānau samau kṛitvā nāsābhyantara-chāriṇau yatendriya-mano-buddhir munir mokṣha-parāyaṇaḥ vigatechchhā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- sparśhān
- — contacts (through senses)
- kṛitvā
- — keeping
- bahiḥ
- — outside
- bāhyān
- — external
- chakṣhuḥ
- — eyes
- cha
- — and
- eva
- — certainly
- antare
- — between
- bhruvoḥ
- — of the eyebrows
- prāṇa-apānau
- — the outgoing and incoming breaths
- samau
- — equal
- kṛitvā
- — keeping
- nāsa-abhyantara
- — within the nostrils
- chāriṇau
- — moving
- yata
- — controlled
- indriya
- — senses
- manaḥ
- — mind
- buddhiḥ
- — intellect
- muniḥ
- — the sage
- mokṣha
- — liberation
- parāyaṇaḥ
- — dedicated
- vigata
- — free
- ichchhā
- — desires
- bhaya
- — fear
- krodhaḥ
- — anger
- yaḥ
- — who
- sadā
- — always
- muktaḥ
- — liberated
- eva
- — certainly
- saḥ
- — that person
भावार्थ
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
व्याख्या
"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः, प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।" — बाहरी स्पर्शों को बाहर करके, दृष्टि को भौंहों के बीच स्थिर करके, नासिका में चलने वाले प्राण और अपान को सम करके। यह श्लोक (5.28 में जारी) गीता का एक ध्यान तकनीक का पहला स्पष्ट वर्णन है — जो पतंजलि की धारणा-ध्यान-समाधि और अध्याय 6 में विस्तृत तकनीकों की स्पष्ट पूर्व-सूचना देता है। तीन निर्देश: (1) बाहरी स्पर्शों को बाहर करना (इन्द्रियों का विषयों से पीछे हटना; पतंजलि की प्रणाली में प्रत्याहार); (2) दृष्टि को भौंहों के बीच केन्द्रित करना; (3) प्राण और अपान को सम करना। गीता प्रेस टीका बताती है कि श्वास-समीकरण महत्त्वपूर्ण है: प्राण और अपान की गति सीधे मन की गति से जुड़ी है।
भगवद्गीता 5.27 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
भगवद्गीता 5.27 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
भगवद्गीता 5.27 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण अब वास्तविक ध्यान निर्देश देते हैं! पहला कदम: ध्यान को बाहरी चीज़ों से हटाओ। दूसरा: धीरे से भौंहों के बीच के स्थान की ओर देखो। तीसरा: सुचारू रूप से और एक समान श्वास लो। ये तीन चीज़ें मिलकर मन को शांत और स्थिर करने में मदद करती हैं।
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 5.27 का अर्थ क्या है?
बाहरी स्पर्शों को परे रखकर, दृष्टि भृकुटि के मध्य में स्थिर, नासिका के भीतर प्राण और अपान को संतुलित करते हुए — मनुष्य ध्यान में बैठ जाता है। शरीर और श्वास व्यावहारिक साधन बन जाते हैं।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, पाँचवें अध्याय (कर्म संन्यास योग) में, ध्यान की विधि देते हुए।
गीता 5.27 आज के जीवन में कैसे उतारें?
एक सरल, स्थिर दृष्टि और संतुलित श्वास व्यस्त मन को भी बैठा सकती हैं। तकनीक विनम्र है, पर सच्ची।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 5.27 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 5.27 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →