अध्याय 8 · श्लोक 6— अक्षरब्रह्म योग
Read this verse in English →यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
लिप्यंतरण
yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- yam yam
- — whatever
- vā
- — or
- api
- — even
- smaran
- — remembering
- bhāvam
- — remembrance
- tyajati
- — gives up
- ante
- — in the end
- kalevaram
- — the body
- tam
- — to that
- tam
- — to that
- eva
- — certainly
- eti
- — gets
- kaunteya
- — Arjun, the son of Kunti
- sadā
- — always
- tat
- — that
- bhāva-bhāvitaḥ
- — absorbed in contemplation
भावार्थ
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।
व्याख्या
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्, तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।" — अंत में शरीर त्यागते समय जो भी भाव स्मरण करता है, वही भाव प्राप्त करता है, हे कुन्तीपुत्र, सदा उस भाव में भावित होकर। श्रीकृष्ण 8.5 की शिक्षा को एक सामान्य सिद्धांत में विस्तृत करते हैं। 'यं यं वापि स्मरन्भावम्' — शरीर छोड़ने के क्षण जो भी भाव स्मरण करता है — 'तं तम् एव एति' — वही भाव प्राप्त करता है। पर महत्त्वपूर्ण योग्यता अंतिम वाक्यांश में आती है: 'सदा तद्भावभावितः' — सदा उस भाव में भावित होकर। शंकराचार्य इस निर्णायक बिंदु पर बल देते हैं: अंतिम स्मरण यादृच्छिक नहीं। जो अंतिम क्षण स्वाभाविक रूप से उठता है वह है जिसमें कोई जीवन भर 'सदा भावित' रहा। यह 8.5 को सुंदर रूप से स्पष्ट करता है। जैसे कोई जीया, वैसे ही मरता है। व्यावहारिक शिक्षा गहन है: तुम जिस पर लगातार ध्यान देते हो, तुम वही बनते हो।
भगवद्गीता 8.6 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण एक गहन सिद्धांत बताते हैं: तुम जो बनते हो वह इससे आकार लेता है कि तुम लगातार किस पर ध्यान देते हो। अंतिम विचार यादृच्छिक नहीं — यह वह है जिसमें तुम जीवन भर 'सदा भावित' रहे। तुम्हारा अभ्यस्त मानसिक फोकस गहरे खाँचे बनाता है, और सबसे संवेदनशील क्षण, तुम्हारा मन उन खाँचों में स्वतः गिरता है। यह रोज़मर्रा के जीवन में भी सत्यापन योग्य रूप से सच है: तुम जिस पर बार-बार ध्यान देते हो वह तुम्हारा डिफ़ॉल्ट बनता है। तुम बस विचार नहीं रख रहे — तुम हर दिन अपने मन को प्रशिक्षित कर रहे हो। अपना अभ्यस्त फोकस सावधानी से चुनो।
भगवद्गीता 8.6 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण एक प्रोफाउंड प्रिंसिपल बताते हैं: तुम जो बनते हो वह इससे शेप होता है कि तुम CONSTANTLY किस पर ड्वेल करते हो। फाइनल थॉट रैंडम नहीं — यह वह है जिसमें तुम जीवन भर 'सदा एब्सॉर्ब्ड' रहे। तुम्हारा हैबिचुअल फोकस डीप ग्रूव्स कार्व करता है, और सबसे वल्नरेबल मोमेंट, तुम्हारा माइंड उन ग्रूव्स में ऑटोमैटिकली गिरता है। यह एवरीडे लाइफ में भी ट्रू है: तुम जिस पर रिपीटेडली अटेंशन देते हो वह तुम्हारी डिफ़ॉल्ट सेटिंग बनती है। तुम लिटरली वही बनते हो जिस पर ड्वेल करते हो।
भगवद्गीता 8.6 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण एक शक्तिशाली रहस्य साझा करते हैं: तुम जिसके बारे में सोचते और सबसे ज़्यादा प्रेम करते हो वह तुम्हारा हिस्सा बन जाता है! जो विचार तुम बार-बार, हर दिन रखते हो वे धीरे-धीरे तुम्हारे हृदय और मन को आकार देते हैं। यह घास में एक रास्ते की तरह है — जितना ज़्यादा तुम उस पर चलते हो, उतना साफ होता है, जब तक तुम स्वाभाविक रूप से उसी तरह चलते हो! तो अगर तुम अपने दिन दयालु, प्रेमपूर्ण, खुश विचारों से भरते हो, वे तुम्हारा स्वाभाविक रास्ता बनते हैं। अपने रोज़मर्रा के विचार बुद्धिमानी से चुनो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।
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