अध्याय 8 · श्लोक 7— अक्षरब्रह्म योग
Read this verse in English →तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
लिप्यंतरण
tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam
शब्दार्थ (अन्वय)
- tasmāt
- — therefore
- sarveṣhu
- — in all
- kāleṣhu
- — times
- mām
- — me
- anusmara
- — remember
- yudhya
- — fight
- cha
- — and
- mayi
- — to me
- arpita
- — surrender
- manaḥ
- — mind
- buddhiḥ
- — intellect
- mām
- — to me
- eva
- — surely
- eṣhyasi
- — you shall attain
- asanśhayaḥ
- — without a doubt
भावार्थ
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
व्याख्या
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च, मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः।" — इसलिए सब समय मुझे स्मरण करो और युद्ध करो। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके, तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त होगे; इसमें कोई संदेह नहीं। श्रीकृष्ण 8.5-6 से व्यावहारिक निष्कर्ष निकालते हैं, और यह गहराई से महत्त्वपूर्ण है। चूँकि अंतिम अवस्था जीवन भर के अभ्यस्त फोकस पर निर्भर है (8.6), समाधान स्पष्ट है: 'सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर' — सब समय मुझे स्मरण करो। फिर प्रभावशाली, व्यावहारिक आदेश: 'युध्य च' — और युद्ध करो! शंकराचार्य यहाँ गहन एकीकरण उजागर करते हैं: आध्यात्मिक स्मरण अपने कर्तव्य में सक्रिय संलग्नता का विरोधी नहीं है। श्रीकृष्ण नहीं कहते 'युद्ध से हटो और ध्यान करो।' वे कहते हैं: अपना कर्तव्य करो और दिव्य को साथ ही स्मरण करो। यह गीता की सबसे महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक शिक्षाओं में से एक है।
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यह एक पंक्ति में गीता का पूरा दर्शन है: 'मुझे स्मरण करो, और युद्ध करो।' तुम्हें आंतरिक आध्यात्मिक जीवन और संसार में सक्रिय संलग्नता के बीच चुनने की ज़रूरत नहीं। श्रीकृष्ण नहीं कहते 'अपने कर्तव्य छोड़ो और गुफा में ध्यान करो' — वे कहते हैं अपना काम करो और अपनी गहनतम जागरूकता को किसी उच्च में जड़ा रखो, साथ-साथ। यह कई लोगों द्वारा महसूस किए जाने वाले 'आध्यात्मिक जीवन' और 'वास्तविक जीवन' के बीच के झूठे विभाजन को घोलता है। एकीकरण बिंदु है: जीवन से पीछे हटना नहीं, बल्कि आंतरिक लंगर के साथ पूर्ण संलग्नता।
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यह एक लाइन में गीता का पूरा फिलॉसफी है: 'मुझे रिमेम्बर करो, AND फाइट करो।' तुम्हें इनर स्पिरिचुअल लाइफ और दुनिया में फुली एक्टिव होने के बीच चूज़ नहीं करना। श्रीकृष्ण नहीं कहते 'अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ छोड़ो और गुफा में मेडिटेट करो' — वे कहते हैं अपना काम करो AND अपनी डीपेस्ट अवेयरनेस को किसी हायर में रूटेड रखो, सेम टाइम पर। यह 'स्पिरिचुअल लाइफ' और 'रियल लाइफ' के बीच के फाल्स स्प्लिट को डिज़ॉल्व करता है। ग्राइंड हार्ड, और हार्ट को कनेक्टेड रखो।
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श्रीकृष्ण अर्जुन को — और हमें — अद्भुत सलाह देते हैं: 'हर समय मुझे याद करो, और अपना कर्तव्य करो!' वे यह नहीं कहते कि अपना काम बंद करो और केवल प्रार्थना करो। वे कहते हैं तुम भगवान को याद कर सकते हो और जो भी तुम्हें करना है वह एक साथ कर सकते हो! तुम पढ़ते, खेलते, घर में मदद करते समय भगवान के प्रेमपूर्ण विचार सोच सकते हो — कभी भी! तुम्हें अच्छा होने और अपनी गतिविधियाँ करने के बीच चुनने की ज़रूरत नहीं। बस अपने हृदय में भगवान को रखो!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।
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