अध्याय 8 · श्लोक 13— अक्षरब्रह्म योग
Read this verse in English →गीता 8.13 एक उज्ज्वल अभ्यास को नाम देती है: ओम् का जप करते हुए, वह अक्षर-ब्रह्म जो स्वयं ब्रह्म है, और शरीर छोड़ते समय श्रीकृष्ण को मन में रखते हुए — ऐसा मनुष्य परम लक्ष्य को प्राप्त होता है। एक पवित्र शब्द एक पूरे जीवन के स्मरण को थामे है।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
लिप्यंतरण
oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran yaḥ prayāti tyajan dehaṁ sa yāti paramāṁ gatim
शब्दार्थ (अन्वय)
- om
- — sacred syllable representing the formless aspect of God
- iti
- — thus
- eka-akṣharam
- — one syllabled
- brahma
- — the Absolute Truth
- vyāharan
- — chanting
- mām
- — me (Shree Krishna)
- anusmaran
- — remembering
- yaḥ
- — who
- prayāti
- — departs
- tyajan
- — quitting
- deham
- — the body
- saḥ
- — he
- yāti
- — attains
- paramām
- — the supreme
- gatim
- — goal
भावार्थ
(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
व्याख्या
यह प्रसिद्ध श्लोक कहता है: 'ॐ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए, मुझे स्मरण करते हुए, जो कोई शरीर त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।' श्रीकृष्ण समापन निर्देश देते हैं, 8.12 में शुरू तकनीक को पूरा करते हुए। अभ्यास के तीन एकीकृत तत्त्व हैं। 'ॐ इति एकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्' — ॐ इस एक अक्षर का उच्चारण, जो ध्वनि-रूप में ब्रह्म ही है। 'मां अनुस्मरन्' — मुझे स्मरण करते हुए। 'यः प्रयाति त्यजन्देहम्' — जो कोई शरीर त्यागकर जाता है। परिणाम: 'स याति परमां गतिम्' — वह परम गति प्राप्त करता है। शंकराचार्य एकीकरण समझाते हैं: पवित्र अक्षर ॐ का उच्चारण किया जाता है जबकि मन साथ ही अर्थ — दिव्य स्वयं — स्मरण करता है। ध्वनि और उसका अर्थ एक होते हैं। यह श्लोक मृत्यु पर अध्याय की केंद्रीय शिक्षा पूरा करता है।
भगवद्गीता 8.13 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
ॐ — परम्परा में सबसे पवित्र ध्वनि — यहाँ अंतिम क्षण स्मरण के लिए मौखिक लंगर के रूप में प्रकट होता है। गहरा सिद्धांत ध्यान देने योग्य है: एक ध्वनि, शब्द, या वाक्यांश, दोहराया और अर्थ से भरा, मन के लिए एक शक्तिशाली लंगर बन सकता है। यह अब अच्छी तरह समझा जाता है: एक मंत्र, एक सार्थक वाक्यांश, लगातार दोहराया, एक विश्वसनीय हैंडल बन जाता है जिसे मन पकड़ सकता है, विशेषकर तनाव में। बिंदु एक विशेष अक्षर का जादू नहीं — यह कि तुम एक ध्वनि-और-अर्थ संयोजन को इतनी गहराई से प्रशिक्षित कर सकते हो कि यह स्वतः उपलब्ध हो।
भगवद्गीता 8.13 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
ॐ — परम्परा में सबसे सेक्रेड साउंड — यहाँ फाइनल मोमेंट रिमेम्ब्रेंस के लिए वर्बल एंकर के रूप में दिखता है। डीपर प्रिंसिपल नोट करने योग्य है: एक साउंड, वर्ड, या फ्रेज़, रिपीटेड और मीनिंग से इन्फ्यूज्ड, माइंड के लिए पावरफुल एंकर बन सकता है। यह अब वेल अंडरस्टुड है: एक मंत्र, एक मीनिंगफुल फ्रेज़, कंसिस्टेंटली रिपीटेड, एक रिलायबल हैंडल बन जाता है। एथलीट्स क्यू वर्ड्स यूज़ करते हैं। पेयर ए मीनिंगफुल साउंड विद सिन्सियर फोकस।
भगवद्गीता 8.13 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण विशेष पवित्र ध्वनि साझा करते हैं: 'ॐ'! यह सबसे पवित्र ध्वनि है, जो भगवान का ही प्रतिनिधित्व करती है। वे सिखाते हैं कि जो कोई प्यार से भगवान को याद करते हुए 'ॐ' कहता है वह सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुँचता है! इसके पीछे का मज़ेदार विचार: एक विशेष ध्वनि या शब्द, अर्थ के साथ दोहराया, एक लंगर बन सकता है जो तुम्हारे मन को शांत और स्थिर करता है। यह एक जादुई शांत करने वाला शब्द रखने जैसा है जिस पर तुम हमेशा वापस आ सकते हो!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 8.13 का अर्थ क्या है?
ओम् का जप करते हुए, वह एक-अक्षर अविनाशी जो ब्रह्म है, और शरीर छोड़ते समय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए, मनुष्य परम लक्ष्य को प्राप्त होता है। एक पवित्र शब्द एक पूरे जीवन के स्मरण को थामे है।
'ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'ओम् — एक-अक्षर ब्रह्म' — श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध वचन कि पवित्र शब्द ओम् ही अविनाशी ब्रह्म है।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, आठवें अध्याय (अक्षर ब्रह्म योग) में, शरीर त्यागने के अभ्यास के रूप में ओम् को नाम देते हुए।
गीता 8.13 आज के जीवन में कैसे उतारें?
एक सरल बार-बार जप मन को कुछ स्थिर देता है जहाँ लौटा जा सके। जीवन के अंत तक ऐसी शरण परिचित और विशेष रूप से गहरी दोनों लगती है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 8.13 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 8.13 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →