अध्याय 7 · श्लोक 6— ज्ञान विज्ञान योग
Read this verse in English →एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥
लिप्यंतरण
etad-yonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya ahaṁ kṛitsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayas tathā
शब्दार्थ (अन्वय)
- etat yonīni
- — these two (energies) are the source of
- bhūtāni
- — living beings
- sarvāṇi
- — all
- iti
- — that
- upadhāraya
- — know
- aham
- — I
- kṛitsnasya
- — entire
- jagataḥ
- — creation
- prabhavaḥ
- — the source
- pralayaḥ
- — dissolution
- tathā
- — and
भावार्थ
अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ।
व्याख्या
"एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय, अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।" — जान लो कि सब प्राणी इन दो प्रकृतियों से उत्पन्न हैं। मैं सम्पूर्ण जगत् का स्रोत हूँ, और वैसे ही उसका प्रलय। श्रीकृष्ण 7.4-5 से निष्कर्ष निकालते हैं। सब प्राणी ('सर्वाणि भूतानि') उनकी दो प्रकृतियों के संयोग से उत्पन्न होते हैं — निचली (भौतिक) और उच्च (चेतन)। हर जीवित प्राणी पदार्थ में देहधारी चेतना का संयोजन है। फिर श्रीकृष्ण व्यापक घोषणा करते हैं: 'अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा' — मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्रोत (प्रभव) हूँ, और समान रूप से उसका प्रलय। शंकराचार्य पूर्णता पर बल देते हैं: 'कृत्स्नस्य जगतः' — पूरे ब्रह्माण्ड का। कुछ भी बाहर नहीं। श्रीकृष्ण केवल वास्तविकता का एक हिस्सा नहीं; वे वह आधार हैं जिससे पूरा ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है।
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श्रीकृष्ण लुभावना निष्कर्ष निकालते हैं: हर जीवित प्राणी चेतना और पदार्थ का संयोग है, और पूरा ब्रह्माण्ड — यह सब, बिना अपवाद — एक दिव्य स्रोत से उत्पन्न होता और उसमें घुल जाता है। तुम्हारी जो भी मान्यताएँ हों, इस दृष्टि के पैमाने के साथ बैठो: जो कुछ अस्तित्व में है वह जड़ में जुड़ा है, एक ही आधार से उठता है। अगर सब कुछ एक स्रोत साझा करता है, तो जो अलगाव हम महसूस करते हैं वह गहनतम स्तर पर अंतिम सत्य नहीं है। यह वास्तविक करुणा की नींव है।
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श्रीकृष्ण ब्रेथटेकिंग कन्क्लूज़न ड्रॉ करते हैं: हर लिविंग बीइंग कॉन्शियसनेस और मैटर का फ्यूज़न है, और पूरा यूनिवर्स — यह सब, नो एक्सेप्शन्स — एक डिवाइन सोर्स से इमर्ज होता और उसमें डिज़ॉल्व होता है। तुम्हारी जो भी बिलीफ्स हों, इस स्केल के साथ बैठो: जो कुछ एग्ज़िस्ट करता है रूट पर कनेक्टेड है। अगर सब कुछ एक सोर्स शेयर करता है, तो जो सेपरेटनेस हम फील करते हैं वह डीपेस्ट लेवल पर फाइनल ट्रुथ नहीं। यह रियल कम्पैशन की फाउंडेशन है।
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श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत साझा करते हैं: हर एक जीवित प्राणी दो प्रकृतियों को जोड़कर बनता है — भौतिक शरीर और चेतन आत्मा! और फिर वे सबसे बड़ा सच प्रकट करते हैं: 'मैं पूरे ब्रह्माण्ड का स्रोत हूँ, और सब कुछ अंत में मुझमें लौटता है!' तो जो कुछ अस्तित्व में है — हर तारा, हर पेड़, हर जानवर, हर व्यक्ति — उसी अद्भुत दिव्य स्रोत से आता है! इसका मतलब हम सब गहराई से जुड़े हैं, उसी बड़े सागर की लहरों की तरह!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण अपनी पराा और अपरा प्रकृति, समस्त सृष्टि में अपनी व्याप्ति, चार प्रकार के भक्त, तथा माया द्वारा सत्य के आवरण का वर्णन करते हैं।
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