AskGita

अध्याय 7 · श्लोक 4ज्ञान विज्ञान योग

Read this verse in English
श्लोक 4 / 30

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥

लिप्यंतरण

bhūmir-āpo ’nalo vāyuḥ khaṁ mano buddhir eva cha ahankāra itīyaṁ me bhinnā prakṛitir aṣhṭadhā

शब्दार्थ (अन्वय)

bhūmiḥ
earth
āpaḥ
water
analaḥ
fire
vāyuḥ
air
kham
space
manaḥ
mind
buddhiḥ
intellect
eva
certainly
cha
and
ahankāraḥ
ego
iti
thus
iyam
all these
me
my
bhinnā
divisions
prakṛitiḥ
material energy
aṣhṭadhā
eightfold

भावार्थ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

व्याख्या

"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च, अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।" — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — इस प्रकार मेरी प्रकृति आठ भागों में विभाजित है। श्रीकृष्ण अब अपनी प्रकृति को व्यवस्थित रूप से प्रकट करना शुरू करते हैं, अपनी 'निचली' प्रकृति से। वे 'प्रकृति' — भौतिक प्रकृति — के आठगुना विभाजन की गणना करते हैं: पाँच स्थूल तत्त्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), साथ ही तीन सूक्ष्म शक्तियाँ (मन, बुद्धि, अहंकार)। शंकराचार्य इस वर्गीकरण का महत्त्व बताते हैं। महत्त्वपूर्ण रूप से, श्रीकृष्ण इसे 'मे प्रकृतिः' — मेरी प्रकृति — कहते हैं। यहाँ तक कि भौतिक संसार भी ईश्वर से अलग नहीं। ध्यान दो कि मन, बुद्धि और अहंकार यहाँ 'भौतिक' प्रकृति के भाग के रूप में वर्गीकृत हैं, चेतन आत्मा नहीं। सच्चा स्व सब आठ से परे है।

भगवद्गीता 7.4 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण वास्तविकता का एक उल्लेखनीय मानचित्र देते हैं, और एक विवरण गहन है: मन, बुद्धि और अहंकार 'भौतिक' प्रकृति के रूप में वर्गीकृत हैं — उपकरण का हिस्सा, चेतन आत्मा नहीं। इसका मतलब तुम्हारे विचार, तुम्हारा तर्क, और यहाँ तक कि तुम्हारा 'मैं' का भाव उपकरण हैं, सबसे गहरे तुम नहीं। यह अंतर्दृष्टि सब ध्यान की नींव है: तुम अपने विचारों को देख सकते हो, जिसका मतलब है तुम अपने विचार नहीं हो। मानसिक मशीनरी के पीछे का साक्षी असली स्व है।

भगवद्गीता 7.4 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण रियलिटी का एक रिमार्केबल मैप ड्रॉप करते हैं, और एक डिटेल माइंड-ब्लोइंग है: माइंड, इंटेलेक्ट और ईगो 'मटीरियल' नेचर के रूप में क्लासिफाइड हैं — इक्विपमेंट का हिस्सा, कॉन्शियस सेल्फ नहीं। मतलब: तुम्हारे थॉट्स, तुम्हारा रीज़निंग, यहाँ तक कि तुम्हारा 'मैं' का भाव इंस्ट्रूमेंट्स हैं, डीपेस्ट तुम नहीं। यह सब मेडिटेशन की फाउंडेशन है: तुम अपने थॉट्स ऑब्ज़र्व कर सकते हो, मतलब तुम अपने थॉट्स नहीं हो।

भगवद्गीता 7.4 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण समझाना शुरू करते हैं कि सब कुछ किससे बना है! वे आठ चीज़ें गिनाते हैं जो पूरे भौतिक संसार को बनाती हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, और मन, बुद्धि, तथा 'मैं' का भाव। और वे कहते हैं ये सब उनकी प्रकृति का हिस्सा हैं — भगवान की ऊर्जा! यहाँ कुछ आश्चर्यजनक है: यहाँ तक कि तुम्हारे विचार और तुम्हारा 'मैं' का भाव भी इस भौतिक संसार का हिस्सा हैं, जैसे तुम्हारे उपयोग के औज़ार। असली, सबसे गहरे तुम कुछ और भी विशेष हो!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी पराा और अपरा प्रकृति, समस्त सृष्टि में अपनी व्याप्ति, चार प्रकार के भक्त, तथा माया द्वारा सत्य के आवरण का वर्णन करते हैं।

अध्याय पढ़ें