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अध्याय 12 · श्लोक 4भक्ति योग

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गीता 12.4 — askgita पर Gita Verses on Selfless Service and Helping Others (Seva) पर पाठों में उद्धृत।

गीता 12.4 उस चित्र को पूरा करती है: निराकार मार्ग पर चलने वाले, जो इन्द्रियों को वश में रखते हैं, सर्वत्र समभाव रहते हैं, और सब प्राणियों के कल्याण में रत हैं, वे भी प्रभु को पाते हैं। उनकी निःस्वार्थ सेवा और समता उन्हें कठिनतर राह से घर पहुँचा देती है।

श्लोक 4 / 20

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥

लिप्यंतरण

sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

indriya-grāmam
all the senses
sarvatra
everywhere
sama-buddayaḥ
equally disposed
prāpnuvanti
achieve
mām
unto Me
eva
certainly
sarva-bhūtahite
all living entities' welfare
ratāḥ
engaged.

भावार्थ

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

व्याख्या

श्रीकृष्ण चिंतकों का वर्णन पूरा करते हैं: 'सब इन्द्रियों को संयमित करके, सर्वत्र समान बुद्धि वाले, सब प्राणियों के कल्याण में रत — वे भी मुझे प्राप्त करते हैं।' श्रीकृष्ण उनका वर्णन समाप्त करते हैं जो निर्गुण निरपेक्ष की उपासना करते हैं। वे चिह्नित हैं: इन्द्रिय-संयम, सर्वत्र समता, और सुंदर रूप से: 'सर्वभूतहिते रताः' — सब प्राणियों के कल्याण में रत। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष: 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' — वे भी मुझे प्राप्त करते हैं। विशेष रूप से 'सर्वभूतहिते रताः' ध्यान दो — सब प्राणियों के कल्याण में आनंदित। निराकार पथ पर भी, वास्तविक प्राप्ति का चिह्न सबके प्रति सक्रिय सद्भावना है। अंतर्दृष्टि: 'सर्वभूतहिते रताः' — सब प्राणियों के कल्याण में आनंदित — दोनों पथों पर वास्तविक आध्यात्मिक प्राप्ति के चिह्न के रूप में प्रकट होता है। यह प्रामाणिक आध्यात्मिकता की एक महत्त्वपूर्ण परीक्षा है। पथ कितना भी उदात्त हो, असली प्रमाण यह है: क्या यह सब प्राणियों के लिए वास्तविक सद्भावना में खिलता है? अगर तुम परखना चाहते हो कि कोई पथ काम कर रहा है, अपनी आंतरिक शांति नहीं — दूसरों के लिए अपनी सक्रिय देखभाल मापो।

भगवद्गीता 12.4 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण चिंतनशील पथ का चित्र पूरा करते हैं, और एक वाक्यांश उभरता है: 'सब प्राणियों के कल्याण में आनंदित' (सर्वभूतहिते रताः)। प्रभावशाली रूप से, यही चिह्न — सबके कल्याण के लिए सक्रिय देखभाल — दोनों पथों पर वास्तविक प्राप्ति के संकेत के रूप में प्रकट होता है। यह प्रामाणिक आध्यात्मिकता की एक महत्त्वपूर्ण परीक्षा है। पथ कितना भी उदात्त हो, असली प्रमाण यह है: क्या यह सब प्राणियों के लिए वास्तविक सद्भावना में खिलता है? एक 'आध्यात्मिकता' जो तुम्हें शांत बनाती है पर ठंडा और दूसरों के कल्याण के प्रति उदासीन छोड़ती है कहीं गलत हो गई है। यह एक शक्तिशाली निदान है। अगर तुम परखना चाहते हो कि कोई पथ काम कर रहा है, केवल अपनी आंतरिक शांति मत मापो — दूसरों के लिए अपनी सक्रिय देखभाल मापो।

भगवद्गीता 12.4 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण कंटेम्प्लेटिव पाथ का पिक्चर कम्प्लीट करते हैं, और एक फ्रेज़ स्टैंड आउट करता है: 'सब बीइंग्स के वेलफेयर में रिजॉइसिंग' (सर्वभूतहिते रताः)। स्ट्राइकिंगली, यही मार्क — सबके वेल-बीइंग के लिए एक्टिव केयर — दोनों पाथ्स पर जेन्युइन अटेनमेंट के साइन के रूप में शो अप करता है। यह ऑथेंटिक स्पिरिचुअलिटी की एक क्रूशियल टेस्ट है। पाथ कितना भी लॉफ्टी हो, रियल प्रूफ यह है: क्या यह सब बीइंग्स के लिए जेन्युइन गुडविल में फ्लावर होता है? एक 'स्पिरिचुअलिटी' जो तुम्हें सेरीन बनाती है पर कोल्ड और दूसरों के वेलफेयर के प्रति इंडिफरेंट छोड़ती है कहीं गलत हो गई। यह एक पावरफुल डायग्नोस्टिक है। केवल अपनी इनर पीस मत मापो — दूसरों के लिए अपनी एक्टिव केयर मापो।

भगवद्गीता 12.4 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण उन लोगों का वर्णन समाप्त करते हैं जो भगवान को निराकार तरीके से पूजते हैं। वे अपनी इन्द्रियाँ नियंत्रित करते हैं, हर जगह शांत और संतुलित रहते हैं, और — यहाँ सबसे सुंदर हिस्सा — वे सब जीवित प्राणियों की मदद करने और सबके कल्याण की परवाह करने में आनंद लेते हैं! और श्रीकृष्ण कहते हैं: 'वे भी मुझे प्राप्त करते हैं!' कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण ध्यान दो: सबके कल्याण की परवाह दोनों पथों पर दिखती है — प्रेमपूर्ण तरीका और निराकार तरीका! चाहे तुम कोई भी पथ लो, वास्तविक आध्यात्मिक अच्छाई हमेशा दूसरों के लिए वास्तविक दया और देखभाल के रूप में दिखती है! यह हमें एक अद्भुत परीक्षा सिखाता है: अगर तुम जानना चाहते हो कि कोई सच में बुद्धिमान बन रहा है, बस देखो कि वे सबके प्रति कितने दयालु हैं!

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 12.4 का अर्थ क्या है?

जो निराकार की उपासना करते हुए इन्द्रियों को संयमित रखते हैं, सब स्थितियों में समभाव रहते हैं, और सब प्राणियों के कल्याण में आनंदित होते हैं, वे भी प्रभु को पाते हैं। समता और सबके हित की भावना उन्हें उसी लक्ष्य तक ले जाती है।

यह श्लोक किसने कहा?

भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, बारहवें अध्याय (भक्ति योग) में, यह पुष्टि करते हुए कि निराकार का मार्ग भी उन्हीं तक ले जाता है।

गीता 12.4 आज के जीवन में कैसे उतारें?

साकार भक्ति के बिना भी, आत्म-संयम, समता और सबके कल्याण की सच्ची भावना का जीवन शिखर तक पहुँचता है। सेवा और समता स्वयं एक गहन आध्यात्मिक मार्ग हैं।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण सगुण भक्ति को सरलतम और निश्चित मार्ग बताते हैं। वे विभिन्न साधकों हेतु क्रमिक साधन और उन गुणों का वर्णन करते हैं जिनसे भक्त उन्हें प्रिय होता है।

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प्रामाणिक स्रोत

ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।