अध्याय 5 · श्लोक 22— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →गीता 5.22 — askgita पर Gita Verses on Why We Suffer and How to End Suffering, Gita Verses on Controlling Desires and Temptation पर पाठों में उद्धृत।
गीता 5.22 एक गम्भीर निदान देती है: इन्द्रिय-संयोग से जन्मे सुखों का आदि और अंत है, और वे दुःख की गर्भभूमि हैं — ज्ञानी उनमें नहीं रमते। हर इन्द्रिय-उच्चता में अंत पहले से पका हुआ है।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
लिप्यंतरण
ye hi sansparśha-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te ādyantavantaḥ kaunteya na teṣhu ramate budhaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- ye
- — which
- hi
- — verily
- sansparśha-jāḥ
- — born of contact with the sense objects
- bhogāḥ
- — pleasures
- duḥkha
- — misery
- yonayaḥ
- — source of
- eva
- — verily
- te
- — they are
- ādya-antavantaḥ
- — having beginning and end
- kaunteya
- — Arjun, the son of Kunti
- na
- — never
- teṣhu
- — in those
- ramate
- — takes delight
- budhaḥ
- — the wise
भावार्थ
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।
व्याख्या
"ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते, आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।" — इन्द्रिय-स्पर्श से जन्मे भोग दुःख के गर्भ ही हैं; आदि-अंत वाले हैं, हे कुन्तीपुत्र। बुद्धिमान उनमें रमण नहीं करता। यह श्लोक इन्द्रिय-सुख की प्रकृति पर गीता के सबसे स्पष्ट कथनों में से एक है। तीन दावे मिलकर: (1) इन्द्रिय-सम्पर्क से जन्मे सुख 'दुःखयोनयः' हैं — शाब्दिक रूप से 'दुःख के गर्भ'; (2) उनके 'आद्यन्तवन्तः' — आरम्भ और अंत — हैं; (3) बुद्धिमान इसलिए उनमें अपनी खुशी नहीं लगाता। पहला दावा स्पष्ट है: सम्पर्क-जन्म सुख 'दुःख का गर्भ' है। शंकराचार्य बताते हैं: सम्पर्क से जन्मे सुख के लिए सुखद वस्तु या परिस्थिति की निरंतर उपस्थिति चाहिए। जब वह परिस्थिति बदलती है — और वह अवश्य बदलती है — सुख समाप्त होता है।
भगवद्गीता 5.22 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
हेडोनिक अनुकूलन पर आधुनिक मनोविज्ञान का शोध ठीक वही पुष्टि करता है जो यह श्लोक बताता है: बाहरी परिस्थितियों से जन्मे सुख आदतन आधार-रेखा पर लौट जाते हैं। हमें पदोन्नति, रिश्ता, सम्पत्ति मिलती है — और हफ्तों या महीनों में खुशी का स्तर वापस वहाँ लौट जाता है जहाँ था। यह विशिष्ट उपलब्धि की विफलता नहीं; यह सम्पर्क-जन्म सुख की अंतर्निहित संरचना है।
भगवद्गीता 5.22 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
बाहरी सम्पर्क से सुख 'दुःख के गर्भ' हैं — इसलिए नहीं कि वे बुरे हैं बल्कि उनकी संरचना के कारण। वे शुरू होते हैं, शिखर पर पहुँचते हैं, और समाप्त होते हैं। हेडोनिक अनुकूलन असली है: तुम्हें वह मिलता है जो तुम चाहते थे, थोड़े समय के लिए अच्छा महसूस होता है, फिर बेसलाइन पर वापस। गीता आनंद-विरोधी नहीं है — यह पूछ रही है: कुछ ऐसी चीज़ पर अपनी खुशी की नींव मत बनाओ जो संरचनात्मक रूप से फीकी पड़ जाती है।
भगवद्गीता 5.22 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
छूने, चखने और चीज़ें अनुभव करने के भोग अद्भुत हैं — पर वे हमेशा समाप्त होते हैं। और जब समाप्त होते हैं, तुम और चाहते हो, जो दुःख ला सकता है! बुद्धिमान व्यक्ति चीज़ें आनंद लेता है पर अपनी गहरी खुशी के लिए उन पर निर्भर नहीं करता। यह आइसक्रीम का आनंद लेने जैसा है — अद्भुत! — पर यह जानते हुए कि आइसक्रीम खत्म होने पर तुम्हारी खुशी नहीं जाती।
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 5.22 का अर्थ क्या है?
इन्द्रिय-संयोग से जन्मे सुखों का आदि और अंत है, और वे दुःख की गर्भभूमि हैं; ज्ञानी उनमें नहीं रमते। हर इन्द्रिय-उच्चता में अंत पहले से पका हुआ है।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, पाँचवें अध्याय (कर्म संन्यास योग) में, इन्द्रिय-सुख की सीमा पर।
गीता 5.22 आज के जीवन में कैसे उतारें?
हर इन्द्रिय-सुख अपना अंत और बाद की वेदना ले चलता है। यह स्पष्ट देखना ही तुम्हें फँसे बिना भोगने देता है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 5.22 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 5.22 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →