अध्याय 5 · श्लोक 23— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
लिप्यंतरण
śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- śhaknoti
- — is able
- iha eva
- — in the present body
- yaḥ
- — who
- soḍhum
- — to withstand
- prāk
- — before
- śharīra
- — the body
- vimokṣhaṇāt
- — giving up
- kāma
- — desire
- krodha
- — anger
- udbhavam
- — generated from
- vegam
- — forces
- saḥ
- — that person
- yuktaḥ
- — yogi
- saḥ
- — that person
- sukhī
- — happy
- naraḥ
- — person
भावार्थ
इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।
व्याख्या
"शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्, कामक्रोधोद्भवं वेगमं स युक्तः स सुखी नरः।" — जो यहीं, शरीर से मोक्ष से पहले, काम और क्रोध से उत्पन्न आवेग को सहन कर सकता है — वह व्यक्ति योग में युक्त और सुखी है। यह श्लोक आध्यात्मिक विकास का एक व्यावहारिक परीक्षण पहचानता है: काम और क्रोध से उत्पन्न आवेग (वेग) को, कर्म या प्रतिक्रियात्मक वाणी में अनुवादित होने से पहले, सहन करने की क्षमता। 'इहैव' फिर — यहीं, इस शरीर में — यह वर्तमान जीवन की उपलब्धि है। काम (इच्छा) और क्रोध (क्रोध) की जोड़ी 3.37 के अनुरूप है। साथ मिलकर वे दो मौलिक प्रतिक्रियात्मक गतिविधियाँ दर्शाते हैं। महत्त्वपूर्ण है 'सोढुम्' — सहन करना, झेलना। आवेग समाप्त करना नहीं — गीता कभी वादा नहीं करती। जो नियंत्रण में है: आवेग पर कार्य करना या नहीं।
भगवद्गीता 5.23 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
आवेग और प्रतिक्रिया के बीच का स्थान अभ्यास में स्वतंत्रता का क्षेत्र है। विक्टर फ्रैंकल ने इस अंतर्दृष्टि को नोट किया: 'उत्तेजना और प्रतिक्रिया के बीच एक स्थान है। उस स्थान में हमारी प्रतिक्रिया चुनने की शक्ति है।' गीता ने उसी स्थान को 2500 साल पहले आध्यात्मिक अभ्यास के स्थान के रूप में नामित किया। जो इस स्थान का उपयोग कर सकता है — जो इच्छा या क्रोध का आवेग महसूस कर सकता है और तुरंत इसे डिस्चार्ज नहीं करता — 'युक्त' और 'सुखी' कहलाता है।
भगवद्गीता 5.23 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
आवेग और कर्म के बीच का अंतर वहाँ है जहाँ स्वतंत्रता रहती है। तुम इच्छा या क्रोध महसूस करते हो — पूरी तरह सामान्य, अनियंत्रणीय — पर तुम्हें तुरंत इस पर एक्ट नहीं करना है। वह पॉज़ अभ्यास है। गीता जो व्यक्ति उस पॉज़ को लगातार बनाए रख सकता है उसे 'युक्त' और 'सुखी' कहती है।
भगवद्गीता 5.23 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
कभी-कभी हमें कुछ कठोर कहने या कुछ ऐसा करने की तीव्र इच्छा होती है जो हम जानते हैं नहीं करना चाहिए — यह इच्छा या क्रोध का आवेग है। श्रीकृष्ण कहते हैं: सुखी और बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो वह इच्छा महसूस कर सकता है और कार्य करने से पहले रुक सकता है! वे हमेशा तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते। वे साँस लेते हैं, रुकते हैं, चुनते हैं।
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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