अध्याय 5 · श्लोक 18— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
लिप्यंतरण
vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini śhuni chaiva śhva-pāke cha paṇḍitāḥ sama-darśhinaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- vidyā
- — divine knowledge
- vinaya
- — humbleness
- sampanne
- — equipped with
- brāhmaṇe
- — a Brahmin
- gavi
- — a cow
- hastini
- — an elephant
- śhuni
- — a dog
- cha
- — and
- eva
- — certainly
- śhva-pāke
- — a dog-eater
- cha
- — and
- paṇḍitāḥ
- — the learned
- sama-darśhinaḥ
- — see with equal vision
भावार्थ
ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।
व्याख्या
"विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि, शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।" — ज्ञानी विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, और श्वपाक में समान दृष्टि रखते हैं। यह श्लोक सम्पूर्ण भारतीय दर्शन में समान दृष्टि (समदर्शन) के सबसे प्रभावशाली सूत्रों में से एक है। सूची जानबूझकर चरम है: सामाजिक पदानुक्रम में सबसे सम्मानित (विद्याविनयसम्पन्न ब्राह्मण) से सबसे हाशिये पर (श्वपाक — कुत्ते खाने वाला) तक, बीच में पशु। वर्णित दृष्टि आधुनिक राजनीतिक अर्थ में सामाजिक समानतावाद नहीं है। इसका अर्थ है बुद्धिमान व्यक्ति उसी आत्मा — उसी एक शुद्ध चेतना — को इन रूपों में से प्रत्येक के माध्यम से अभिव्यक्त देखते हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपनी वेदांतिक सामाजिक दृष्टि में इस श्लोक का व्यापक उपयोग किया: प्रत्येक प्राणी में दिव्यता की पहचान, सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना, वास्तविक करुणा और सम्मान की नींव के रूप में।
भगवद्गीता 5.18 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
समदर्शन एक दार्शनिक रुख या सबको समान देखने का मजबूरी वाला अभ्यास नहीं है। यह उसी चेतना — उसी आत्मा — को हर रूप के माध्यम से अभिव्यक्त पहचानने का स्वाभाविक परिणाम है। यही इसे वास्तविक, गैर-प्रदर्शनकारी करुणा में अनुवादित करता है: तुम कम भाग्यशाली को नीचे से दान नहीं दे रहे; तुम उसी स्व को दूसरे रूप में पहचान रहे हो।
भगवद्गीता 5.18 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
बुद्धिमान व्यक्ति एक विशिष्ट प्रोफेसर, एक गाय, एक हाथी, एक आवारा कुत्ते, और समाज के हाशिये पर एक बेघर व्यक्ति में उसी आत्मा को देखता है। यह भोली समानता नहीं — वे अभी भी व्यावहारिक अंतर पहचान सकते हैं। पर गहनतम स्तर पर, उनमें सब के माध्यम से वही चेतना अभिव्यक्त हो रही है। यही असली करुणा की नींव है: 'मुझे तुम्हारी दया आती है' नहीं बल्कि 'मैं तुम में खुद को पहचानता हूँ।'
भगवद्गीता 5.18 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
बुद्धिमान लोग उसी सुंदर प्रकाश को — आत्मा को — सब में और हर चीज़ में चमकते देखते हैं: एक प्रतिभाशाली विद्वान, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ता, और यहाँ तक कि सड़क पर सबसे गरीब व्यक्ति। बाहर बहुत अलग दिखता है, पर अंदर — आत्मा — सब में एक है!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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