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अध्याय 6 · श्लोक 29आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 29 / 47

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥

लिप्यंतरण

sarva-bhūta-stham ātmānaṁ sarva-bhūtāni chātmani īkṣhate yoga-yuktātmā sarvatra sama-darśhanaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

sarva-bhūta-stham
situated in all living beings
ātmānam
Supreme Soul
sarva
all
bhūtāni
living beings
cha
and
ātmani
in God
īkṣhate
sees
yoga-yukta-ātmā
one united in consciousness with God
sarvatra
everywhere
sama-darśhanaḥ
equal vision

भावार्थ

सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्तःकरणवाला योगा अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें देखता है।

व्याख्या

"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि, ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।" — योग में युक्त आत्मा वाला, सर्वत्र समान दृष्टि वाला, सब प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है। श्रीकृष्ण अब उस रूपांतरित दृष्टि का वर्णन करते हैं जो उनके सिखाए योग से उठती है। 'योगयुक्तात्मा' एक गहन दोहरा सत्य देखता है: वही आत्मा सब प्राणियों में निवास करती, और सब प्राणी उस एक आत्मा में निवास करते। शंकराचार्य समझाते हैं कि यह काव्यात्मक भावना नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रत्यक्ष धारणा है जिसने आत्मा को साकार किया है। अपनी गहनतम प्रकृति को सार्वभौमिक आत्मा के रूप में पहचानकर, व्यक्ति अनिवार्य रूप से उसी आत्मा को हर प्राणी की आंतरिक वास्तविकता के रूप में पहचानता है। 'सर्वत्र समदर्शनः' — सर्वत्र समान देखना — मुख्य स्वर है। यह एक देखना है, विश्वास करना नहीं।

भगवद्गीता 6.29 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

सबसे गहरा ध्यान निजी आनंद में समाप्त नहीं होता — यह बदलता है कि तुम सबको कैसे देखते हो। तुम हर प्राणी में वही मूलभूत चेतना देखना शुरू करते हो, और सब प्राणियों को उस एक आत्मा में थामा पहचानते हो। यह मजबूर सकारात्मकता या अपनाया गया विश्वास नहीं; यह वास्तविक धारणा में बदलाव है। व्यावहारिक फल गहन है: वास्तविक करुणा मेहनती होना बंद कर देती है जब तुम सचमुच दूसरों में खुद को देखते हो।

भगवद्गीता 6.29 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

डीपेस्ट मेडिटेशन प्राइवेट ब्लिस में एंड नहीं होता — यह बदलता है कि तुम लिटरली सबको कैसे देखते हो। तुम हर बीइंग में वही कोर कॉन्शियसनेस परसीव करना शुरू करते हो। यह फोर्स्ड पॉज़िटिविटी नहीं — यह परसेप्शन में असली शिफ्ट है। पेऑफ बड़ा है: जेन्युइन कम्पैशन एफर्ट जैसा महसूस होना बंद कर देती है जब तुम लिटरली दूसरों में खुद को देखते हो। 'मी' और 'देम' के बीच की दीवारें पतली हो जाती हैं।

भगवद्गीता 6.29 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

गहरे ध्यान के बाद, तुम्हारे दुनिया को देखने के तरीके में कुछ सुंदर होता है! तुम देखना शुरू करते हो कि वही अद्भुत आत्मा — वही प्रकाश — सबके और हर चीज़ के अंदर रहती है, और सब प्राणी उस एक महान आत्मा के भीतर रहते हैं। यह यह समझने जैसा है कि हर लहर उसी बड़े सागर का हिस्सा है! जब तुम यह देखते हो, तुम स्वाभाविक रूप से सबके लिए प्रेम और दया महसूस करते हो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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