अध्याय 14 · श्लोक 2— गुणत्रय विभाग योग
Read this verse in English →इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥
लिप्यंतरण
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha
शब्दार्थ (अन्वय)
- idam
- — this
- jñānam
- — wisdom
- upāśhritya
- — take refuge in
- mama
- — mine
- sādharmyam
- — of similar nature
- āgatāḥ
- — having attained
- sarge
- — at the time of creation
- api
- — even
- na
- — not
- upajāyante
- — are born
- pralaye
- — at the time of dissolution
- na-vyathanti
- — they will not experience misery
- cha
- — and
भावार्थ
इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।
व्याख्या
श्रीकृष्ण इस ज्ञान का फल बताते हैं: 'इस ज्ञान में शरण लेकर, मेरे स्वभाव के समान होकर, वे सृष्टि के समय जन्म नहीं लेते, न प्रलय के समय व्यथित होते हैं।' श्रीकृष्ण इस शिक्षा को साकार करने का सर्वोच्च परिणाम वर्णन करते हैं। शंकराचार्य 'साधर्म्य' समझाते हैं — दिव्य के साथ स्वभाव की समानता प्राप्त करना। जो सच में इस ज्ञान को साकार करते हैं वे दिव्य के अपने अपरिवर्तनीय, शाश्वत स्वभाव में हिस्सा लेने आते हैं। परिणामस्वरूप, वे पूरे ब्रह्मांडीय चक्र को लाँघते हैं: जब ब्रह्मांड बनता है तब जन्म में नहीं बहाए जाते, न जब ब्रह्मांड विलीन होता है तब हिलते हैं। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि एक इतनी गहरी स्थिरता की छवि है कि सबसे बड़ा संभव उथल-पुथल भी — पूरे ब्रह्मांडों की रचना और विलय — इसे विचलित नहीं कर सकता। यह सिद्धांत साधारण जीवन तक शक्तिशाली रूप से कम होता है: हमें उपलब्ध स्थिरता की एक जगह है। जब तुम्हारा व्यक्तिगत 'ब्रह्मांड' ढहता लगता है — एक रिश्ता समाप्त होता है, एक करियर बिखरता है — तब भी तुम में कुछ है जो अछूता रहता है। सबक: अपनी स्थिरता का भाव बाहरी चीज़ों पर मत बनाओ जो ढह सकती हैं। इसे अपनी सबसे गहरी, अपरिवर्तनीय प्रकृति पर बनाओ।
भगवद्गीता 14.2 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि एक इतनी गहरी स्थिरता की चौंका देने वाली छवि है कि सबसे बड़ा कल्पनीय उथल-पुथल भी — पूरे ब्रह्मांडों की रचना और विलय — इसे विचलित नहीं कर सकता। 'प्रलय के समय व्यथित नहीं' एक चौंका देने वाला दावा है: जब वस्तुतः सब कुछ विलीन होता है, इस ज्ञान में स्थापित व्यक्ति पूरी तरह अविचल रहता है। अब, तुम और मैं आज वास्तविक ब्रह्मांडीय विलय का सामना नहीं कर रहे। पर अंतर्निहित सिद्धांत साधारण मानव जीवन तक शक्तिशाली रूप से कम होता है: हमें उपलब्ध स्थिरता की एक जगह है, हमारी सबसे गहरी अपरिवर्तनीय प्रकृति में निहित। जब तुम्हारा व्यक्तिगत 'ब्रह्मांड' ढहता लगता है, तब भी तुम में कुछ है जो अछूता रहता है। गीता सच्ची सुरक्षा को अपने बाहरी संसार को स्थिर रखने में नहीं बल्कि जो नहीं बदलता उसमें स्थापित होने में रखती है। सबक: अपनी स्थिरता बाहरी चीज़ों पर मत बनाओ जो ढह सकती हैं। इसे अपनी सबसे गहरी, अपरिवर्तनीय प्रकृति पर बनाओ।
भगवद्गीता 14.2 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट एक इतनी डीप स्टेबिलिटी की स्टैगरिंग इमेज है कि सबसे बड़ा कल्पनीय अपहीवल भी — पूरे यूनिवर्सेज़ की क्रिएशन और डिज़ॉल्यूशन — इसे डिस्टर्ब नहीं कर सकता। 'प्रलय के समय व्यथित नहीं' एक ब्रेथटेकिंग क्लेम है: जब लिटरली सब कुछ डिज़ॉल्व होता है, इस नॉलेज में एस्टैब्लिश्ड व्यक्ति पूरी तरह अनशेकन रहता है। अब, तुम और मैं आज लिटरल कॉस्मिक डिज़ॉल्यूशन फेस नहीं कर रहे। पर अंडरलाइंग प्रिंसिपल ऑर्डिनरी लाइफ तक पावरफुली स्केल डाउन होता है: हमें अवेलेबल स्टेबिलिटी की एक जगह है, हमारी डीपेस्ट चेंजलेस नेचर में रूटेड। जब तुम्हारा पर्सनल 'यूनिवर्स' कोलैप्स होता लगता है, तब भी तुम में कुछ है जो अनटच्ड रहता है। गीता ट्रू सिक्योरिटी को अपने एक्सटर्नल वर्ल्ड को स्टेबल रखने में नहीं बल्कि जो नहीं बदलता उसमें एस्टैब्लिश्ड होने में रखती है। सबक: अपनी स्टेबिलिटी एक्सटर्नल चीज़ों पर मत बनाओ जो कोलैप्स हो सकती हैं। इसे अपनी डीपेस्ट, चेंजलेस नेचर पर बनाओ।
भगवद्गीता 14.2 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण इस ज्ञान को सच में समझने का अद्भुत परिणाम साझा करते हैं: जो सच में इसे समझते हैं वे इतने स्थिर और शाश्वत से जुड़े हो जाते हैं कि कुछ भी उन्हें हिला नहीं सकता — यहाँ तक कि अगर पूरा ब्रह्मांड बने या समाप्त हो जाए! कल्पना करो अंदर इतने गहराई से शांत और स्थिर होना कि सबसे बड़े, सबसे डरावने बदलाव भी तुम्हें परेशान न कर सकें! अब, हम आज पूरे ब्रह्मांड के समाप्त होने की चिंता नहीं कर रहे! पर यह हमें हमारे रोज़मर्रा के जीवन के लिए कुछ अद्भुत सिखाता है: तुम्हारे भीतर गहराई में एक शांत, स्थिर जगह है जिसे तुम्हारी दुनिया के सबसे बड़े बदलाव भी हिला नहीं सकते! कभी-कभी हमारी अपनी छोटी दुनिया बिखरती लगती है — पर तब भी, अंदर एक गहरा, शांत तुम है जो स्थिर और ठीक रहता है! रहस्य: वास्तविक सुरक्षा यह सुनिश्चित करने से नहीं आती कि कुछ भी कभी न बदले। यह तुम्हारे भीतर गहरी, शांत, अपरिवर्तनीय जगह खोजने से आती है!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।
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