अध्याय 14 · श्लोक 27— गुणत्रय विभाग योग
Read this verse in English →ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
लिप्यंतरण
brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha
शब्दार्थ (अन्वय)
- brahmaṇaḥ
- — of Brahman
- hi
- — only
- pratiṣhṭhā
- — the basis
- aham
- — I
- amṛitasya
- — of the immortal
- avyayasya
- — of the imperishable
- cha
- — and
- śhāśhvatasya
- — of the eternal
- cha
- — and
- dharmasya
- — of the dharma
- sukhasya
- — of bliss
- aikāntikasya
- — unending
- cha
- — and
भावार्थ
क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अध्याय को अपनी पहचान से समाप्त करते हैं: 'क्योंकि मैं ब्रह्म का आश्रय हूँ — अमर और अविनाशी, शाश्वत धर्म, और परम आनंद।' श्रीकृष्ण अध्याय को यह प्रकट करके समाप्त करते हैं कि भक्त उनके माध्यम से जो प्राप्त करता है उसकी प्रकृति क्या है। शंकराचार्य इस चरम प्रकटीकरण को समझाते हैं। श्रीकृष्ण खुद को ब्रह्म का 'आश्रय' घोषित करते हैं, अमर और अविनाशी परम वास्तविकता — और शाश्वत धर्म और परम, अनकंडीशन्ड आनंद का भी (ऐकांतिक सुख — आनंद जो किसी बाहरी चीज़ पर निर्भर नहीं, जो उतार-चढ़ाव नहीं करता)। यह दिखाता है कि भक्ति का मार्ग कहाँ ले जाता है: उस दिव्य की ओर जो स्वयं अमरत्व, शाश्वत धर्म, और अविफल आनंद का आधार है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'परम, अनकंडीशन्ड आनंद' (ऐकांतिक सुख) का सुंदर वर्णन है सबसे गहरी वास्तविकता की प्रकृति के रूप में — एक आनंद जो किसी बाहरी चीज़ पर निर्भर नहीं और उतार-चढ़ाव नहीं करता। पूरा अध्याय गुणों के बारे में रहा है — सदा बदलती अवस्थाएँ। वह सब खुशी कंडीशन्ड है। पर यहाँ श्रीकृष्ण कुछ बिल्कुल अलग इशारा करते हैं: 'ऐकांतिक सुख।' सबक: केवल कंडीशन्ड खुशी का पीछा करना बंद करो — वह जो परिस्थितियों पर निर्भर है। एक गहरा, अनकंडीशन्ड आनंद है जो तुम्हारे सबसे गहरे स्व की प्रकृति है। उसे खोजो।
भगवद्गीता 14.27 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'परम, अनकंडीशन्ड आनंद' (ऐकांतिक सुख) का सुंदर, आशापूर्ण वर्णन है सबसे गहरी वास्तविकता की प्रकृति के रूप में — एक आनंद जो किसी बाहरी चीज़ पर निर्भर नहीं और बिल्कुल उतार-चढ़ाव नहीं करता। यह अध्याय समाप्त करने के लिए एक गहन और उत्थानकारी स्वर है। पूरा अध्याय गुणों के बारे में रहा है — सदा बदलती अवस्थाएँ जो हमें इधर-उधर फेंकती हैं। वह सब खुशी कंडीशन्ड है: यह पूरी तरह बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर है, यह उठती-गिरती है। पर यहाँ श्रीकृष्ण कुछ बिल्कुल अलग इशारा करते हैं: 'ऐकांतिक सुख' — परम, अनकंडीशन्ड आनंद जो सबसे गहरी वास्तविकता की प्रकृति है। यह तुम्हारे सबसे गहरे स्वभाव का अंतर्निहित आनंद है। यह खुशी की पूरी मानवीय खोज को पुनः फ्रेम करता है। हम अपना जीवन कंडीशन्ड खुशी का पीछा करने में बिताते हैं। पर यह हमेशा फिसल जाती है। सबक: केवल कंडीशन्ड खुशी का पीछा करना बंद करो। एक गहरा, अनकंडीशन्ड आनंद है जो तुम्हारे सबसे गहरे स्व की प्रकृति है। उसे खोजो।
भगवद्गीता 14.27 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट 'एब्सोल्यूट, अनकंडीशन्ड ब्लिस' (ऐकांतिक सुख) का ब्यूटीफुल, होपफुल डिस्क्रिप्शन है सबसे डीप रियलिटी की नेचर के रूप में — एक ब्लिस जो किसी एक्सटर्नल चीज़ पर डिपेंड नहीं और बिल्कुल फ्लक्चुएट नहीं करता। यह चैप्टर एंड करने के लिए एक प्रोफाउंड नोट है। पूरा चैप्टर गुणों के बारे में रहा है — एवर-शिफ्टिंग स्टेट्स जो हमें इधर-उधर फेंकती हैं। वह सब हैप्पीनेस कंडीशन्ड है: यह पूरी तरह एक्सटर्नल सर्कमस्टैंसेज़ पर डिपेंड है, यह राइज़ और फॉल होती है। पर यहाँ श्रीकृष्ण कुछ कम्प्लीटली डिफरेंट पॉइंट करते हैं: 'ऐकांतिक सुख' — एब्सोल्यूट, अनकंडीशन्ड ब्लिस जो सबसे डीप रियलिटी की नेचर है। यह हैप्पीनेस की पूरी ह्यूमन सर्च को रीफ्रेम करता है। हम अपनी लाइफ कंडीशन्ड हैप्पीनेस चेज़ करने में बिताते हैं। पर यह हमेशा स्लिप अवे होती है। सबक: केवल कंडीशन्ड हैप्पीनेस चेज़ करना बंद करो। एक डीपर, अनकंडीशन्ड ब्लिस है जो तुम्हारे डीपेस्ट सेल्फ की नेचर है। उसे सीक करो।
भगवद्गीता 14.27 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण इस अध्याय को एक सुंदर, आशापूर्ण विचार से समाप्त करते हैं! वे प्रकट करते हैं कि सबसे गहरी वास्तविकता — और तुम्हारा अपना सबसे गहरा स्वभाव — 'अनकंडीशन्ड आनंद' से भरा है! 'अनकंडीशन्ड' का क्या मतलब? इसका मतलब एक खुशी जो तुम्हारे बाहर किसी चीज़ पर निर्भर नहीं — एक आनंद जो इस पर ऊपर-नीचे नहीं होता कि क्या होता है! यहाँ बड़ा विचार है: हम जो अधिकांश खुशी का पीछा करते हैं वह 'कंडीशन्ड' है — यह चीज़ों पर निर्भर है! 'मैं खुश रहूँगा अगर मुझे यह खिलौना मिले।' पर वैसी खुशी हमेशा आती-जाती है! पर श्रीकृष्ण कहते हैं एक अलग तरह की खुशी है — एक गहरा, स्थिर आनंद जो बस तुम्हारे सबसे गहरे स्व की प्राकृतिक अवस्था है! यह बाहर कुछ अच्छा होने पर निर्भर नहीं। यह हमेशा वहाँ है, तुम्हारे भीतर गहरा, एक खजाने की तरह! तो उस गहरी, स्थिर खुशी को भीतर खोजो — यह तुम्हारा असली खजाना है, और यह कभी फीकी नहीं पड़ती!
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अध्याय सन्दर्भ
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