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अध्याय 8 · श्लोक 14अक्षरब्रह्म योग

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गीता 8.14 एक सुंदर निकटता बताती है: जो योगी निरंतर श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, जिसका मन अन्यत्र नहीं जाता, उसके लिए वे सुलभ हैं — सदा उसकी पहुँच में। न भटकने वाली भक्ति दिव्यता को आसान हाथ की पहुँच में ले आती है।

श्लोक 14 / 28

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥

लिप्यंतरण

ananya-chetāḥ satataṁ yo māṁ smarati nityaśhaḥ tasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha nitya-yuktasya yoginaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

ananya-chetāḥ
without deviation of the mind
satatam
always
yaḥ
who
mām
me
smarati
remembers
nityaśhaḥ
regularly
tasya
to him
aham
I
su-labhaḥ
easily attainable
pārtha
Arjun, the son of Pritha
nitya
constantly
yuktasya
engaged
yoginaḥ
of the yogis

भावार्थ

हे पृथानन्दन ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।

व्याख्या

यह प्रिय श्लोक कहता है: 'जो निरंतर मुझे स्मरण करता है, और कुछ नहीं सोचता — उस नित्य युक्त योगी के लिए, हे पार्थ, मैं सुलभ हूँ।' मृत्यु पर तकनीकी शिक्षा (8.12-13) के बाद, श्रीकृष्ण एक अद्भुत आश्वस्त करने वाला और सुलभ वादा देते हैं। 'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः' — जो अविचलित मन (अनन्यचेताः) से, निरंतर (सततम्) मुझे स्मरण करता है — 'तस्य अहं सुलभः' — उस व्यक्ति के लिए मैं सुलभ हूँ। यह अन्यत्र बल दी गई कठिनाई के साथ एक प्रभावशाली विरोधाभास है। कुंजी है 'अनन्यचेताः सततम्' — अविचलित, निरंतर स्मरण। शंकराचार्य सुंदर निहितार्थ उजागर करते हैं: जिस पथ को उन्नत तकनीकों की ज़रूरत है उसका एक सरल हृदय है — निरंतर प्रेमपूर्ण स्मरण। यह श्लोक गहराई से सांत्वना देता है।

भगवद्गीता 8.14 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

सब माँग भरे तकनीकी निर्देश के बाद, श्रीकृष्ण एक सुंदर सरल और आश्वस्त करने वाला वादा देते हैं: जो दिव्य को निरंतर, अविचलित हृदय से स्मरण करता है, उसके लिए दिव्य सुलभ है। कठिन हिस्सा जटिलता नहीं — निरंतरता है। तुम्हें उन्नत तकनीकों की ज़रूरत नहीं; तुम्हें स्थिर, पूर्ण-हृदय, अविचलित फोकस चाहिए। यह प्रोत्साहनजनक और एक अलग तरह से चुनौतीपूर्ण भी है। पथ केवल विशेषज्ञों द्वारा महारत योग्य विस्तृत विधियों के पीछे बंद नहीं है। सबक: गहराई जटिलता से अधिक निरंतरता से आती है।

भगवद्गीता 8.14 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

सब डिमांडिंग टेक्निकल इंस्ट्रक्शन के बाद, श्रीकृष्ण एक ब्यूटीफुली सिंपल, रीअश्योरिंग प्रॉमिस ड्रॉप करते हैं: जो डिवाइन को कॉन्स्टेंटली, अनडिस्ट्रैक्टेड हार्ट से रिमेम्बर करता है, उसके लिए डिवाइन EASY है। हार्ड पार्ट कॉम्प्लेक्सिटी नहीं — कॉन्स्टेंसी है। तुम्हें एडवांस्ड टेक्नीक्स की ज़रूरत नहीं; तुम्हें स्टेडी, होलहार्टेड फोकस चाहिए। पाथ केवल एक्सपर्ट्स के पीछे गेटकेप्ट नहीं है। टेकअवे: डेप्थ कॉम्प्लेक्सिटी से ज़्यादा कॉन्सिस्टेंसी से आती है।

भगवद्गीता 8.14 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

सब उन्नत शिक्षाओं के बाद, श्रीकृष्ण सबसे मीठा, सबसे सरल रहस्य साझा करते हैं! वे कहते हैं: 'जो कोई पूरे हृदय से हर समय प्यार से मुझे याद करता है, उसके लिए मैं सुलभ हूँ!' क्या यह अद्भुत नहीं? तुम्हें फैंसी, जटिल तकनीकों की ज़रूरत नहीं। सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ बस भगवान को अक्सर और प्रेम से अपने हृदय में रखना है! कठिन हिस्सा कुछ जटिल करना नहीं — बस स्थिर और निरंतर रहना है। हर दिन की एक सरल, प्रेमपूर्ण आदत फैंसी चीज़ से ज़्यादा शक्तिशाली है!

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 8.14 का अर्थ क्या है?

जो योगी निरंतर श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, जिसका मन अन्यत्र नहीं जाता, उसके लिए श्रीकृष्ण सुलभ हैं — सदा उसकी पहुँच में। न भटकने वाली भक्ति दिव्यता को आसान हाथ की पहुँच में ले आती है।

यह श्लोक किसने कहा?

भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, आठवें अध्याय (अक्षर ब्रह्म योग) में, निरंतर भक्त को सुगम पहुँच का वचन देते हुए।

गीता 8.14 आज के जीवन में कैसे उतारें?

जो दूर लगता है प्रायः इसलिए लगता है क्योंकि ध्यान बिखरा है। स्थिर, न भटकने वाला स्मरण उस दूरी को मात्र प्रयास से अधिक पाटता है।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।

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प्रामाणिक स्रोत

ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।