अध्याय 18 · श्लोक 23— मोक्ष संन्यास योग
Read this verse in English →गीता 18.23 कर्म के शुद्धतम प्रकार का वर्णन करती है: जो कर्म अपना उचित कर्तव्य हो, आसक्ति बिना किया गया, राग-द्वेष से न चलाया गया, फल की चाह न रखने वाले द्वारा। ऐसा स्वच्छ, अनासक्त कर्म सात्त्विक कहलाता है।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
लिप्यंतरण
niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣhataḥ kṛitam aphala-prepsunā karma yat tat sāttvikam uchyate
शब्दार्थ (अन्वय)
- niyatam
- — in accordance with scriptures
- saṅga-rahitam
- — free from attachment
- arāga-dveṣhataḥ
- — free from attachment and aversion
- kṛitam
- — done
- aphala-prepsunā
- — without desire for rewards
- karma
- — action
- yat
- — which
- tat
- — that
- sāttvikam
- — in the mode of goodness
- uchyate
- — is called
भावार्थ
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण सात्त्विक कर्म का वर्णन करते हैं: 'जो कर्म नियत है, आसक्ति से रहित, राग-द्वेष के बिना किया गया, फल की इच्छा न करने वाले द्वारा — वह सात्त्विक कहलाता है।' श्रीकृष्ण कर्म का सर्वोच्च रूप देते हैं। शंकराचार्य सात्त्विक कर्म के चार चिह्न उजागर करते हैं: (1) यह सही करने योग्य कर्तव्य है, (2) आसक्ति से मुक्त, (3) राग-द्वेष के बिना किया गया, और (4) फल की इच्छा के बिना। मिलकर: सही कर्म, कर्तव्य से किया गया, आंतरिक समता के साथ, फल-पकड़ से मुक्त। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि कर्म की सर्वोच्च गुणवत्ता के लिए सटीक चार-गुना परीक्षण है — एक व्यावहारिक चेकलिस्ट जिसे तुम किसी भी कर्म पर लागू कर सकते हो। (1) क्या यह वही है जो करना चाहिए? (2) क्या यह आसक्ति से मुक्त है? (3) क्या यह राग-द्वेष से मुक्त है? (4) क्या यह फल-पकड़ से मुक्त है? मिलकर ये चार स्थितियाँ कर्म को सर्वोच्च गुणवत्ता में वर्णित करती हैं। सबक: इस चार-गुना परीक्षण का उपयोग अपने महत्त्वपूर्ण कर्मों पर करो। चारों को सटीक रूप से नाम करना तुम्हें उनकी ओर खुद को प्रशिक्षित करने में मदद करता है।
भगवद्गीता 18.23 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि कर्म की सर्वोच्च गुणवत्ता के लिए सटीक चार-गुना परीक्षण है — एक सच में व्यावहारिक चेकलिस्ट जिसे तुम वास्तव में अपने जीवन में किसी भी महत्त्वपूर्ण कर्म पर लागू कर सकते हो। (1) क्या यह वही है जो करना चाहिए? (2) क्या यह आसक्ति से मुक्त है? (3) क्या यह राग और द्वेष से मुक्त है? (4) क्या यह फल-पकड़ से मुक्त है? मिलकर ये चार स्थितियाँ कर्म को इसकी सर्वोच्च संभव गुणवत्ता में वर्णित करती हैं। ध्यान से देखो एकीकरण: सही वस्तु (कर्तव्य), सही आंतरिक मुद्रा, और परिणामों के साथ सही सम्बन्ध। हर एक अकेले अपर्याप्त है; मिलकर वे पूर्ण, साफ कर्म बनाते हैं। सबक: सक्रिय रूप से इस चार-गुना परीक्षण का उपयोग अपने महत्त्वपूर्ण कर्मों पर करो। सही चीज़, कोई आसक्ति नहीं, कोई पसंद-प्रतिक्रिया नहीं, कोई फल-पकड़ नहीं।
भगवद्गीता 18.23 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट हाईएस्ट क्वालिटी एक्शन के लिए प्रिसाइज़ फोर-फोल्ड टेस्ट है — एक प्रैक्टिकल चेकलिस्ट। (1) क्या यह राइट थिंग है? (2) क्या यह अटैचमेंट-फ्री है? (3) क्या यह लाइक/डिसलाइक-फ्री है? (4) क्या यह फ्रूट-ग्रास्पिंग फ्री है? मिलकर ये कन्डीशन्स एक्शन को इसकी हाईएस्ट पॉसिबल क्वालिटी में डिस्क्राइब करती हैं। सबक: इस फोर-फोल्ड टेस्ट को अपने इम्पॉर्टेंट एक्शन्स पर एक्टिवली यूज़ करो। राइट थिंग, नो अटैचमेंट, नो प्रेफरेंस-रिएक्टिविटी, नो फ्रूट-ग्रास्पिंग।
भगवद्गीता 18.23 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कर्म का सबसे अच्छा प्रकार वर्णन करते हैं — सात्त्विक! इसके चार विशेष गुण साथ हैं: (1) यह करने की सही चीज़ है, (2) तुम इसे आसक्त हुए बिना करते हो, (3) तुम इसे बहुत पसंद या नापसंद किए बिना करते हो, और (4) तुम इसे पुरस्कार की पकड़ बिना करते हो! जब सब चार एक साथ होते हैं, यह सबसे साफ, सबसे अच्छा कर्म है! यह एक चार-भाग की रेसिपी की तरह है: सही चीज़ + कोई अहंकार नहीं + शांत हृदय + कोई पुरस्कार-पीछा नहीं = सबसे अच्छा कर्म! तो इस चेकलिस्ट का उपयोग करो! अगर तुम सब चारों पर हाँ कह सकते हो, तुम सबसे बुद्धिमान, सबसे सुंदर तरीके से कार्य कर रहे हो!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 18.23 का अर्थ क्या है?
जो कर्म अपना विहित कर्तव्य हो, आसक्ति बिना किया गया, राग-द्वेष से रहित, फल की चाह न रखने वाले द्वारा, वह सात्त्विक (शुद्ध) कर्म कहलाता है। केवल कर्म नहीं, बल्कि प्रेरणा और भीतरी भाव उसे शुद्ध बनाते हैं।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 18.23 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 18.23 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Sringeri Sharada Peetham
Sringeri Sharada Peetham — the principal seat of Advaita Vedanta in the lineage of Adi Shankaracharya.
Sringeri →