अध्याय 15 · श्लोक 20— पुरुषोत्तम योग
Read this verse in English →इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
लिप्यंतरण
iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha etad buddhvā buddhimān syāt kṛita-kṛityaśh cha bhārata
शब्दार्थ (अन्वय)
- iti
- — these
- guhya-tamam
- — most secret
- śhāstram
- — Vedic scriptures
- idam
- — this
- uktam
- — spoken
- mayā
- — by me
- anagha
- — Arjun, the sinless one
- etat
- — this
- buddhvā
- — understanding
- buddhi-mān
- — enlightened
- syāt
- — one becomes
- kṛita-kṛityaḥ
- — who fulfills all that is to be accomplished
- cha
- — and
- bhārata
- — Arjun, the son of Bharat
भावार्थ
हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अध्याय समाप्त करते हैं: 'इस प्रकार यह सबसे गुप्त शिक्षा मेरे द्वारा कही गई, हे निष्पाप। इसे जानकर, कोई बुद्धिमान बनता है और अपने सब कर्तव्य पूरे कर लेता है, हे भारत।' श्रीकृष्ण अध्याय 15 को इसके सर्वोच्च मूल्य पर बल देकर समाप्त करते हैं। शंकराचार्य इस शिक्षा को समझने के दो प्रभावशाली परिणाम समझाते हैं। पहला, 'बुद्धिमान्' — कोई सच में बुद्धिमान बनता है। दूसरा, और और भी प्रभावशाली, 'कृत-कृत्य' — कोई 'वह बनता है जिसने वह सब कर लिया जो करने की ज़रूरत थी,' जिसने अस्तित्व का उद्देश्य पूरा कर लिया। यह एक उल्लेखनीय दावा है: परम सत्य को समझना स्वयं महान उपलब्धि है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि प्रभावशाली वाक्यांश 'कृत-कृत्य' है — 'वह जिसने वह सब कर लिया जो करने की ज़रूरत थी।' यह कुछ गहन इशारा करता है कि वास्तव में मानव जीवन को क्या पूरा करता है। हम आमतौर पर एक जीवन की उपलब्धि को बाहरी उपलब्धियों से मापते हैं — करियर, धन, पहचान। उस माप से, हम कभी सच में 'पूर्ण' नहीं; हमेशा और हासिल करने को है। पर गीता उपलब्धि की एक आमूल भिन्न दृष्टि देती है: जो सच में सबसे गहरे सत्य को समझता है 'कृत-कृत्य' है। सबसे गहरी उपलब्धि बाहरी उपलब्धि नहीं; यह आंतरिक अनुभूति है। सबक: एक मानव जीवन की सबसे सच्ची उपलब्धि बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती — यह सबसे गहरे सत्य की आंतरिक अनुभूति है।
भगवद्गीता 15.20 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि प्रभावशाली वाक्यांश 'कृत-कृत्य' है — 'वह जिसने वह सब कर लिया जो करने की ज़रूरत थी,' जिसने अस्तित्व का उद्देश्य पूरा कर लिया। यह कुछ सच में गहन इशारा करता है कि वास्तव में मानव जीवन को क्या पूरा करता है। हम आमतौर पर एक जीवन की उपलब्धि को बाहरी उपलब्धियों से मापते हैं — करियर, धन, पहचान, चेक की गई सूची। उस माप से, हम कभी सच में 'पूर्ण' नहीं; हमेशा और हासिल करने को, और साबित करने को है — और हम सूची अधूरी छोड़कर मरते हैं। पर गीता उपलब्धि की एक आमूल भिन्न दृष्टि देती है: जो सच में सबसे गहरे सत्य को समझता है 'कृत-कृत्य' है। सबसे गहरी उपलब्धि बाहरी उपलब्धि नहीं; यह आंतरिक अनुभूति है। और यह एक उपलब्धि है जो वास्तव में तुम्हें पूर्ण करती है। यह गहराई से मुक्तिदायक है, अंतहीन प्रयास की संस्कृति में। सबक: एक मानव जीवन की सबसे सच्ची उपलब्धि बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती — यह सबसे गहरे सत्य की आंतरिक अनुभूति है। वह अनुभूति वास्तव में एक जीवन को पूर्ण करती है।
भगवद्गीता 15.20 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट स्ट्राइकिंग फ्रेज़ 'कृत-कृत्य' है — 'वह जिसने वह सब कर लिया जो करने की नीड थी,' जिसने एग्ज़िस्टेंस का पर्पस पूरा कर लिया। यह कुछ जेन्युइनली प्रोफाउंड पॉइंट करता है कि वास्तव में ह्यूमन लाइफ को क्या फुलफिल करता है। हम आमतौर पर एक लाइफ की अकम्प्लिशमेंट को एक्सटर्नल अचीवमेंट्स से मापते हैं — करियर, वेल्थ, फॉलोअर्स, चेक की गई गोल्स। उस माप से, हम कभी सच में 'डन' नहीं; हमेशा और अचीव करने को है — और हम लिस्ट अधूरी छोड़कर मरते हैं। पर गीता अकम्प्लिशमेंट की एक रैडिकली डिफरेंट विज़न देती है: जो सच में डीपेस्ट ट्रुथ को समझता है 'कृत-कृत्य' है। डीपेस्ट अकम्प्लिशमेंट एक्सटर्नल अचीवमेंट नहीं; यह इनर रियलाइज़ेशन है। यह डीपली फ्रीइंग है, एंडलेस स्ट्राइविंग की कल्चर में। सबक: एक ह्यूमन लाइफ की सबसे ट्रू अकम्प्लिशमेंट एक्सटर्नल अचीवमेंट्स से नहीं मापी जाती — यह डीपेस्ट ट्रुथ की इनर रियलाइज़ेशन है। रियल कम्प्लीशन इनर है।
भगवद्गीता 15.20 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण इस अध्याय को हमें यह बताकर समाप्त करते हैं कि यह शिक्षा कितनी अद्भुत और महत्त्वपूर्ण है! वे कहते हैं: जब तुम इसे समझते हो, तुम सच में बुद्धिमान बनते हो, और तुम कोई ऐसा बनते हो जिसने 'वह सब कर लिया जो करने की ज़रूरत थी' — तुमने जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ हासिल कर ली! यहाँ सोचने वाली एक दिलचस्प बात है: आमतौर पर, हम मापते हैं कोई कितना 'सफल' है उसकी बाहरी उपलब्धियों से — उनके पास कितना पैसा है, वे कितने प्रसिद्ध हैं। पर यहाँ समस्या है: उस माप से, तुम कभी सच में 'पूर्ण' नहीं! हमेशा और पाने को, और करने को है — यह कभी समाप्त नहीं होता! पर श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत कहते हैं: वह व्यक्ति जो सच में सबसे गहरे सत्य को समझता है — जो जानता है वे गहराई से कौन हैं — ने सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ कर ली है! वे 'पूर्ण' हैं! तो काम करो, खेलो, अच्छी चीज़ें करो — पर जानो कि सबसे गहरी 'सफलता' तुम्हारे हृदय में रहने वाली अद्भुत समझ है!
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अध्याय सन्दर्भ
संसार को उल्टे अश्वत्थ वृक्ष के रूप में बताकर श्रीकृष्ण वैराग्यरूपी कुल्हाड़ी से उसे काटना सिखाते हैं। वे स्वयं को क्षर और अक्षर से परे पुरुषोत्तम के रूप में प्रकट करते हैं।
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