अध्याय 6 · श्लोक 21— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
लिप्यंतरण
sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- sukham
- — happiness
- ātyantikam
- — limitless
- yat
- — which
- tat
- — that
- buddhi
- — by intellect
- grāhyam
- — grasp
- atīndriyam
- — transcending the senses
- vetti
- — knows
- yatra
- — wherein
- na
- — never
- cha
- — and
- eva
- — certainly
- ayam
- — he
- sthitaḥ
- — situated
- chalati
- — deviates
- tattvataḥ
- — from the Eternal Truth
भावार्थ
जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता।
व्याख्या
"सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्, वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।" — वह अत्यंत सुख जो शुद्ध बुद्धि से ग्रहण होता है और इन्द्रियों से परे है — जब कोई इसे जानता है, उसमें स्थित होकर वह सत्य से कभी विचलित नहीं होता। समाधि का वर्णन जारी रखते हुए (6.20-23), श्रीकृष्ण गहरे ध्यान में खोजे आनंद का वर्णन करते हैं। यह 'सुखमात्यन्तिकम्' है — असीम, परम सुख, इन्द्रियों के सीमित और क्षणभंगुर सुख नहीं। यह 'अतीन्द्रियम्' है — इन्द्रियों से परे। और यह 'बुद्धिग्राह्यम्' है — शुद्ध, सूक्ष्म बुद्धि से ग्रहण किया गया। शंकराचार्य महत्त्वपूर्ण भेद खींचते हैं: सामान्य सुख इन्द्रिय-विषयों पर निर्भर हैं और इसलिए सीमित हैं। यह आनंद बिल्कुल अलग कोटि का है। श्लोक का दूसरा भाग एक शक्तिशाली आश्वासन है: इसमें स्थित होकर, व्यक्ति सत्य से विचलित नहीं होता। इस परम आनंद को चखने के बाद, व्यक्ति छोटे सुखों से नहीं खिंचता।
भगवद्गीता 6.21 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
एक प्रकार का आनंद है जो किसी बाहरी चीज़ पर निर्भर नहीं — इन्द्रियों से ग्रहण नहीं बल्कि सूक्ष्म, बसे मन से पहचाना गया। हर इन्द्रिय-सुख (जो उतार-चढ़ाव करता और फीका पड़ता है) के विपरीत, यह आनंद स्थिर है क्योंकि यह परिस्थितियों पर निर्भर ही नहीं। और यहाँ व्यावहारिक लाभ है: एक बार जब तुमने इसे सच में चख लिया, छोटे ध्यान-भटकाव अपनी पकड़ खो देते हैं। बड़ा आनंद खोजने पर, बाध्यकारी पीछा स्वाभाविक रूप से शांत होता है।
भगवद्गीता 6.21 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
एक जॉय है जो किसी एक्सटर्नल चीज़ पर डिपेंड नहीं — सेंसेज़ से ग्रैब नहीं बल्कि सटल, सेटल्ड माइंड से रिकग्नाइज़्ड। हर सेंस-प्लेज़र (जो स्पाइक फिर फेड होता है) के अनलाइक, यह जॉय स्टेबल है क्योंकि यह ज़ीरो कंडीशन्स पर रिलाई करती है। पेऑफ बड़ा है: एक बार जब तुमने इसे चखा, छोटे डिस्ट्रैक्शन्स अपनी ग्रिप खो देते हैं। कुछ छोटा कॉम्पीट नहीं कर सकता।
भगवद्गीता 6.21 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण ध्यान में गहराई में पाई एक विशेष प्रकार की खुशी का वर्णन करते हैं — एक विशाल, अंतहीन आनंद जो तुम्हारी आँखों, कानों या जीभ से नहीं आता, बल्कि तुम्हारे बुद्धिमान, शांत मन से महसूस होता है! यह खिलौनों या मिठाइयों की खुशी से बिल्कुल अलग है, जो हमेशा फीकी पड़ जाती है। यह आनंद रहता है! और एक बार जब तुम इसे महसूस कर लेते हो, तुम कभी सत्य से दूर नहीं जाना चाहते!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
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