अध्याय 13 · श्लोक 9— क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
Read this verse in English →इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥
लिप्यंतरण
indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam
शब्दार्थ (अन्वय)
- indriya-artheṣhu
- — toward objects of the senses
- vairāgyam
- — dispassion
- anahankāraḥ
- — absence of egotism
- eva cha
- — and also
- janma
- — of birth
- mṛityu
- — death
- jarā
- — old age
- vyādhi
- — disease
- duḥkha
- — evils
- doṣha
- — faults
- anudarśhanam
- — perception
भावार्थ
इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखना।
व्याख्या
श्रीकृष्ण ज्ञान के गुण जारी रखते हैं: 'इन्द्रिय-विषयों के प्रति वैराग्य, और अहंकार का अभाव; जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग, और दुःख के दोषों पर चिंतन...' श्रीकृष्ण सच्चे ज्ञान को बनाने वाले गुणों की सूची जारी रखते हैं। शंकराचार्य ध्यान देते हैं कि यह अंतिम गुण — जन्म, वृद्धावस्था, रोग, और मृत्यु में निहित पीड़ा का ईमानदारी से सामना करना — स्वयं सच्चे ज्ञान का हिस्सा है। यह रुग्णता नहीं बल्कि स्पष्ट दृष्टि है: बुद्धिमान व्यक्ति देहधारी अस्तित्व की दर्दनाक वास्तविकताओं से नहीं छिपता बल्कि उन्हें ईमानदारी से ध्यान में रखता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि जीवन के कठिन सत्यों — जन्म, वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु — का ईमानदारी से सामना करने का सच्चे ज्ञान के एक घटक के रूप में आश्चर्यजनक समावेश है। हमारी संस्कृति हमें इन वास्तविकताओं से बचने में मदद करने के लिए अथक काम करती है। पर गीता ठीक इन कठिन सत्यों के स्पष्ट चिंतन को बुद्धि का हिस्सा नाम करती है। क्यों? क्योंकि जीवन की अनित्यता का ईमानदारी से सामना स्वस्थ वैराग्य और स्पष्टता दोनों पैदा करता है। कठिन सत्यों को ईमानदारी से देखो — और उन्हें जीना सिखाने दो।
भगवद्गीता 13.9 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण ज्ञान को पुनः परिभाषित करते रहते हैं, और यहाँ आश्चर्यजनक समावेश जीवन के कठिन सत्यों — जन्म, वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु — का ईमानदारी से सामना करना है, सच्ची बुद्धि के एक घटक के रूप में। हमारी पूरी संस्कृति हमें इन वास्तविकताओं से बचने में मदद करने के लिए अथक काम करती है। पर गीता ठीक इन कठिन सत्यों के स्पष्ट चिंतन को बुद्धि का हिस्सा नाम करती है। क्यों? क्योंकि जीवन की अनित्यता का ईमानदारी से सामना दो बहुमूल्य चीज़ें पैदा करता है। पहला, स्वस्थ वैराग्य: जब तुम सच में समझते हो कि सब भौतिक क्षणभंगुर है, तुम स्वाभाविक रूप से जो टिक नहीं सकता उसमें अधिक-निवेश बंद कर देते हो। दूसरा, स्पष्टता कि क्या मायने रखता है। यह रुग्ण के विपरीत है — यह गहराई से स्पष्ट और मुक्त करने वाला है। कठिन सत्यों को ईमानदारी से देखो — और उन्हें जीना सिखाने दो।
भगवद्गीता 13.9 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण नॉलेज को रीडिफाइन करते रहते हैं, और यहाँ सरप्राइज़िंग इन्क्लूज़न लाइफ के हार्ड ट्रुथ्स — बर्थ, एजिंग, सिकनेस, डेथ — को ऑनेस्टली फेस करना है, जेन्युइन विज़डम के एक कंपोनेंट के रूप में। हमारी पूरी कल्चर हमें इन रियलिटीज़ से अवॉइड करने में मदद करने के लिए अथक काम करती है। पर गीता ठीक इन हार्ड ट्रुथ्स के क्लियर-आइड कंटेम्प्लेशन को विज़डम का हिस्सा नेम करती है। क्यों? क्योंकि लाइफ की इम्परमानेंस को ऑनेस्टली फेस करना दो प्रेशस चीज़ें प्रोड्यूस करता है। फर्स्ट, हेल्दी डिस्पैशन। सेकंड, क्लैरिटी कि क्या मैटर करता है। यह मॉर्बिड के ऑपोज़िट है — यह क्लैरिफाइंग और फ्रीइंग है। लाइफ की हार्ड रियलिटीज़ के डिनायल में मत जीओ। उन्हें ऑनेस्टली फेस करो — और उन्हें जीना सिखाने दो।
भगवद्गीता 13.9 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण वास्तविक ज्ञान कैसा दिखता है वर्णन करते रहते हैं, और वे एक आश्चर्यजनक शामिल करते हैं: जीवन के कठिन हिस्सों का ईमानदारी से सामना करना — कि हर कोई बूढ़ा होता है, कभी-कभी बीमार होता है, और कि जीवन हमेशा नहीं रहता। वे कहते हैं इन सत्यों का बहादुरी और ईमानदारी से सामना करना वास्तव में बुद्धिमान होने का हिस्सा है! यह थोड़ा उदास लग सकता है, पर यह वास्तव में बहुत सहायक और मुक्त करने वाला है! क्यों: अधिकांश लोग इन कठिन सत्यों के बारे में न सोचने की बहुत कोशिश करते हैं। पर जब तुम ईमानदारी से समझते हो कि जीवन में सब कुछ बहुमूल्य है और हमेशा नहीं रहता, दो अद्भुत चीज़ें होती हैं! पहला, तुम चीज़ों से इतनी कसकर चिपकना बंद कर देते हो। दूसरा, तुम पता लगाते हो कि क्या सच में मायने रखता है! जीवन के बड़े सत्यों के बारे में ईमानदारी से सोचने से मत डरो!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।
अध्याय पढ़ें →