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अध्याय 13 · श्लोक 10क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 10 / 35

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥

लिप्यंतरण

asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu

शब्दार्थ (अन्वय)

asaktiḥ
non-attachment
anabhiṣhvaṅgaḥ
absence of craving
putra
children
dāra
spouse
gṛiha-ādiṣhu
home, etc
nityam
constant
cha
and
sama-chittatvam
even-mindedness
iṣhṭa
the desirable
aniṣhṭa
undesirable
upapattiṣhu
having obtained

भावार्थ

आसक्तिरहित होना; पुत्र, स्त्री, घर आदिमें एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें चित्तका नित्य सम रहना।

व्याख्या

श्रीकृष्ण ज्ञान के गुण जारी रखते हैं: 'अनासक्ति, पुत्र, पत्नी, घर आदि के प्रति आसक्ति का अभाव; और इष्ट तथा अनिष्ट दोनों घटनाओं के बीच निरंतर समता...' श्रीकृष्ण सच्चे ज्ञान का वर्णन मूर्त गुणों के रूप में जारी रखते हैं। शंकराचार्य यहाँ अनासक्ति का अर्थ स्पष्ट करने में सावधान हैं। इसका मतलब परिवार के प्रति ठंडापन या अपने प्रियजनों को छोड़ना नहीं। शब्द 'अनभिष्वंग' है — अत्यधिक आसक्ति का अभाव, वह अति-पहचान और स्वामित्व पकड़ जो हमें आसक्ति में खो देती है। कोई परिवार को गहराई से प्रेम कर सकता है जबकि इस तरह स्वामित्व से चिंतित रूप से आसक्त नहीं जो आंतरिक स्वतंत्रता नष्ट करता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'अनासक्ति' का सटीक अर्थ है। इसका मतलब परवाह न करना नहीं। गीता का शब्द 'अनभिष्वंग' है — अत्यधिक, स्वामित्व, चिंतित पकड़ का अभाव — प्रेम का अभाव नहीं। गहराई से प्रेम करने और बेताबी से चिपकने में महत्त्वपूर्ण अंतर है। अनासक्ति प्रेम नहीं हटाती; यह बेताब पकड़ हटाती है जो प्रेम को भ्रष्ट करती है। गहराई से प्रेम करो, पर हल्के से थामो।

भगवद्गीता 13.10 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यहाँ स्पष्ट करने योग्य अंतर्दृष्टि, क्योंकि इसे अक्सर बुरी तरह गलत समझा जाता है, 'अनासक्ति' का सटीक अर्थ है। इसका मतलब परवाह न करना, ठंडा होना, या अपने प्रियजनों को छोड़ना नहीं। गीता का वास्तविक शब्द 'अनभिष्वंग' है — अत्यधिक, स्वामित्व, चिंतित पकड़ का अभाव — प्रेम का अभाव नहीं। गहराई से प्रेम करने और बेताबी से चिपकने में महत्त्वपूर्ण अंतर है। अत्यधिक आसक्ति तब है जब तुम्हारा प्रेम स्वामित्व पकड़ बन जाता है — जब तुम लोगों से इतनी चिंतित रूप से चिपकते हो कि अपना केंद्र खो देते हो। अनासक्ति प्रेम नहीं हटाती; यह बेताब पकड़ हटाती है जो प्रेम को भ्रष्ट करती है। वास्तव में, तुम अधिक स्वतंत्र रूप से प्रेम कर सकते हो जब चिपकते नहीं। गहराई से प्रेम करो, पर हल्के से थामो। यह ठंडापन नहीं — यह प्रेम अपने सबसे स्वतंत्र रूप में है।

भगवद्गीता 13.10 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

यहाँ क्लैरिफाई करने योग्य इनसाइट, क्योंकि इसे अक्सर बैडली मिसअंडरस्टैंड किया जाता है, 'नॉन-अटैचमेंट' का प्रिसाइज़ मीनिंग है। इसका मतलब केयर न करना, कोल्ड होना, या अपने लव्ड वन्स को छोड़ना नहीं। गीता का असली शब्द 'अनभिष्वंग' है — एक्सेसिव, पज़ेसिव, एंग्ज़ियस क्लिंगिंग का अभाव — लव का अभाव नहीं। डीपली लव करने और डेस्परेटली क्लिंग करने में क्रूशियल फर्क है। एक्सेसिव अटैचमेंट तब है जब तुम्हारा लव पज़ेसिव ग्रास्पिंग बन जाता है। नॉन-अटैचमेंट लव नहीं हटाती; यह डेस्परेट ग्रास्पिंग हटाती है जो लव को करप्ट करती है। तुम ज़्यादा फ्रीली लव कर सकते हो जब क्लिंग नहीं करते। डीपली लव करो, पर लाइटली होल्ड करो। यह कोल्डनेस नहीं — यह लव अपने सबसे फ्री रूप में है।

भगवद्गीता 13.10 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण वास्तविक ज्ञान का वर्णन करते रहते हैं, और एक महत्त्वपूर्ण है 'अनासक्ति।' पर इसे अक्सर गलत समझा जाता है, तो इसे सही समझें: इसका मतलब यह नहीं कि तुम अपने परिवार को प्रेम करना या परवाह करना बंद कर दो! इसका मतलब तुम उन्हें गहराई से प्रेम करते हो बिना डरकर, पकड़कर बहुत कसकर चिपके! यहाँ अंतर है: एक तितली पकड़ने की कल्पना करो। अगर तुम इसे डर से कसकर पकड़ते हो कि यह उड़ जाएगी, तुम इसे कुचल दोगे! पर अगर तुम इसे धीरे से, खुले हाथ से पकड़ते हो, तुम इसे प्रेम कर सकते हो और इसे मुक्त रहने दे सकते हो! यही रहस्य है: लोगों को गहराई से प्रेम करो, पर उन्हें धीरे से थामो। तुम अभी भी अपने परिवार को पूरे दिल से प्रेम कर सकते हो! तो सबको गहराई से प्रेम करो — पर धीरे से थामो, खुले हाथ से!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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