अध्याय 13 · श्लोक 31— क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
Read this verse in English →यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
लिप्यंतरण
yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā
शब्दार्थ (अन्वय)
- yadā
- — when
- bhūta
- — living entities
- pṛithak-bhāvam
- — diverse variety
- eka-stham
- — situated in the same place
- anupaśhyati
- — see
- tataḥ
- — thereafter
- eva
- — indeed
- cha
- — and
- vistāram
- — born from
- brahma
- — Brahman
- sampadyate
- — (they) attain
- tadā
- — then
भावार्थ
जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अनुभूति का एक और चिह्न देते हैं: 'जब कोई प्राणियों की विविध अवस्थाओं को एक में स्थित देखता है, और उसी से विस्तार होते — तब वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।' श्रीकृष्ण मुक्तिदायक दृष्टि का एक और आयाम वर्णन करते हैं। शंकराचार्य विविधता-में-एकता की इस दृष्टि को समझाते हैं। अनुभूति प्राप्त द्रष्टा देखता है कि प्राणियों की सारी विशाल विविधता — हर अलग रूप — वास्तव में एक अंतर्निहित वास्तविकता में रहती है और उससे उठती है। बहु अंततः अलग, स्वतंत्र चीज़ें नहीं; वे सब एक ब्रह्म की अभिव्यक्तियाँ, विस्तार हैं। असंख्य लहरों की तरह जो एक सागर में रहती और उससे उठती हैं। एकता विविधता का इनकार नहीं बल्कि इसका सबसे गहरा आधार है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि विविधता-में-एकता की सुंदर दृष्टि है। गीता की एकता-दृष्टि विविधता को मिटाती नहीं। बल्कि, यह बहु और एक को एक साथ देखती है। शास्त्रीय छवियाँ इसे पकड़ती हैं: असंख्य लहरें, हर एक सच में अलग, सब एक सागर में रहती। विविधता वास्तविक है — पर यह परम अलगाव नहीं। जीवन की समृद्ध विविधता और इसके नीचे की गहरी एकता दोनों देखना सीखो। विविधता का सम्मान करो और एकता पहचानो।
भगवद्गीता 13.31 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि विविधता-में-एकता की सुंदर दृष्टि है — अस्तित्व की सारी विशाल विविधता को एक अंतर्निहित वास्तविकता में रहते, और उससे विस्तृत होते देखना। यह एक सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण बिंदु है: गीता की एकता-दृष्टि विविधता को मिटाती या इनकार नहीं करती। यह नहीं कहती 'अंतर सब अवास्तविक हैं, केवल एक मौजूद है।' बल्कि, यह बहु और एक को एक साथ देखती है। शास्त्रीय छवियाँ इसे पकड़ती हैं: असंख्य लहरें, हर एक सच में अलग, सब एक सागर में रहती। विविधता पूरी तरह वास्तविक है — पर यह परम, अलग अलगाव नहीं। यह एक परिपक्व दृष्टि है जो दो विपरीत त्रुटियों से बचती है: केवल विविधता देखना (अलगाव), और एक सपाट 'एकता' जो विविधता को मिटाती है। जीवन की समृद्ध विविधता और इसके नीचे की गहरी एकता दोनों देखना सीखो। विविधता का सम्मान करो और एकता पहचानो।
भगवद्गीता 13.31 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट यूनिटी-इन-डायवर्सिटी की ब्यूटीफुल विज़न है — एग्ज़िस्टेंस की सारी डायवर्सिटी को एक अंडरलाइंग रियलिटी में रेस्टिंग, और उससे एक्सपैंडिंग देखना। यह एक सटल और इम्पॉर्टेंट पॉइंट है: गीता की यूनिटी-विज़न डायवर्सिटी को इरेज़ नहीं करती। यह नहीं कहती 'डिफरेंसेज़ सब अनरियल हैं, केवल वन मौजूद है।' बल्कि, यह मेनी और वन को एक साथ देखती है। क्लासिक इमेजेज़ इसे पकड़ती हैं: अनगिनत वेव्स, हर एक सच में डिस्टिंक्ट, सब एक ओशन में रेस्टिंग। डायवर्सिटी पूरी तरह रियल है — पर यह अल्टीमेट सेपरेटनेस नहीं। यह एक मैच्योर विज़न है जो दो ऑपोज़िट एरर्स से बचती है: केवल डायवर्सिटी देखना (एलिएनेशन), और एक फ्लैट 'यूनिटी' जो डायवर्सिटी को इरेज़ करती है। लाइफ की रिच डायवर्सिटी और इसके नीचे की डीप यूनिटी दोनों देखना सीखो।
भगवद्गीता 13.31 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण देखने का एक और सुंदर तरीका साझा करते हैं: यह नोटिस करना कि दुनिया के सब अनेक अलग प्राणी वास्तव में एक अद्भुत वास्तविकता में रहते और उससे आते हैं — कई लहरों की तरह जो सब एक बड़े सागर से आती हैं! यहाँ सुंदर संतुलन है: अनेक अलग चीज़ें सच में अलग और विशेष हैं — फिर भी वे सब एक अद्भुत स्रोत से आती और उसकी हैं! सागर के बारे में सोचो: यह असंख्य लहरें बनाता है, और हर एक लहर अलग है — अलग आकार, कोई दो बिल्कुल एक जैसी नहीं! लहरें सच में अलग हैं! और वे सब वही सागर हैं! दोनों चीज़ें एक साथ सच हैं! यह हम सबके साथ वैसा ही है: हर व्यक्ति अद्भुत रूप से अनोखा है — और हम सब एक अद्भुत वास्तविकता से आते हैं! तो तुम अद्भुत रूप से तुम हो — विशेष! और तुम जीवन के एक बड़े सुंदर सागर का हिस्सा हो! अलग लहरें, एक सागर!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।
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