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अध्याय 13 · श्लोक 29क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 29 / 35

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥

लिप्यंतरण

samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim

शब्दार्थ (अन्वय)

samam
equally
paśhyan
see
hi
indeed
sarvatra
everywhere
samavasthitam
equally present
īśhvaram
God as the Supreme soul
na
do not
hinasti
degrade
ātmanā
by one’s mind
ātmānam
the self
tataḥ
thereby
yāti
reach
parām
the supreme
gatim
destination

भावार्थ

क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण समान दृष्टि का फल देते हैं: 'ईश्वर को सर्वत्र समान उपस्थित देखते हुए, वह स्व द्वारा स्व को नष्ट नहीं करता; इसलिए वह परम गति प्राप्त करता है।' श्रीकृष्ण 13.27 में वर्णित समान दृष्टि का रूपांतरकारी परिणाम समझाते हैं। शंकराचार्य सूक्ष्म वाक्यांश 'वह स्व द्वारा स्व को नष्ट नहीं करता' समझाते हैं। समान दृष्टि वाला — जो सबमें वही दिव्य वास्तविकता देखता है — ऐसे कार्य नहीं करता जो उसकी अपनी सच्ची प्रकृति को नीचा या हानि पहुँचाते हैं। इस समानता को न देखने की त्रुटि ही हमें आध्यात्मिक रूप से खुद को हानि पहुँचाने ले जाती है: जब हम खुद को अलग देखते हैं, हम अहंकार, लोभ, घृणा से कार्य करते हैं — जो हमारे अपने अस्तित्व को नीचा करता है। सही देखना सही होने की ओर ले जाता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि प्रभावशाली वाक्यांश 'वह स्व द्वारा स्व को नष्ट नहीं करता' है। यह कैसे देखते हैं और कैसे खुद को हानि पहुँचाते या मदद करते हैं के बीच गहरा सम्बन्ध प्रकट करता है। जब हम इस एकता को नहीं देखते — जब हम खुद और दूसरों को मूल रूप से अलग देखते हैं — हम अहंकार, लोभ, घृणा से कार्य करते हैं। और हर ऐसा कार्य हमारे अपने अस्तित्व को नीचा करता है। तुम जैसे देखते हो वह सीधे आकार देता है तुम कैसे होते हो। सही देखना सही होने की ओर ले जाता है।

भगवद्गीता 13.29 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि प्रभावशाली वाक्यांश 'वह स्व द्वारा स्व को नष्ट नहीं करता' है — और यह कैसे देखते हैं और कैसे खुद को हानि पहुँचाते या मदद करते हैं के बीच गहरा सम्बन्ध प्रकट करता है। श्रीकृष्ण का दावा है कि समान दृष्टि (सब प्राणियों में वही दिव्य वास्तविकता देखना, खुद सहित) तुम्हें आध्यात्मिक रूप से खुद को हानि पहुँचाने से सक्रिय रूप से बचाती है। कैसे? विपरीत पर विचार करो: जब हम इस एकता को नहीं देखते — जब हम खुद और दूसरों को मूल रूप से अलग देखते हैं — हम अहंकार, लोभ, घृणा से कार्य करते हैं। और हर ऐसा कार्य हमारे अपने अस्तित्व को नीचा करता है। तुम जैसे देखते हो वह सीधे आकार देता है तुम कैसे होते हो। विकृत देखना विकृत, स्व-हानिकारक कार्य पैदा करता है। ध्यान से देखो कि तुम कैसे देखते हो — यह उसके बाद आने वाली हर चीज़ को आकार देता है। सही देखना सीधे सही होने की ओर ले जाता है।

भगवद्गीता 13.29 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट स्ट्राइकिंग फ्रेज़ 'वह स्व द्वारा स्व को नष्ट नहीं करता' है — और यह कैसे देखते हैं और कैसे खुद को हानि पहुँचाते या मदद करते हैं के बीच डीप कनेक्शन रिवील करता है। श्रीकृष्ण का क्लेम है कि इक्वल विज़न (सब बीइंग्स में वही डिवाइन रियलिटी देखना, खुद सहित) तुम्हें स्पिरिचुअली खुद को हार्म करने से प्रोटेक्ट करती है। कैसे? ऑपोज़िट कंसिडर करो: जब हम इस यूनिटी को नहीं देखते — जब हम खुद और दूसरों को फंडामेंटली सेपरेट देखते हैं — हम ईगो, ग्रीड, हेट्रेड से एक्ट करते हैं। और हर ऐसा एक्शन हमारे अपने बीइंग को डिग्रेड करता है। तुम जैसे देखते हो वह सीधे शेप करता है तुम कैसे होते हो। डिस्टॉर्टेड सीइंग डिस्टॉर्टेड, सेल्फ-हार्मिंग एक्शन प्रोड्यूस करता है। ध्यान से देखो कि तुम कैसे देखते हो — राइट सीइंग सीधे राइट बीइंग की ओर ले जाता है।

भगवद्गीता 13.29 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण हर किसी में वही सुंदर चिंगारी देखने का अद्भुत परिणाम समझाते हैं! वे कहते हैं: जब तुम सब प्राणियों में वही अद्भुत उपस्थिति समान रूप से देखते हो, तुम खुद को चोट नहीं पहुँचाते! देखना खुद को चोट पहुँचाने या मदद करने से कैसे जुड़ता है? यहाँ कैसे: जब हम भूल जाते हैं कि हर किसी में वही सुंदर चिंगारी है, और हम सोचते हैं कि हम पूरी तरह अलग और दूसरों से बेहतर या बदतर हैं, हम निर्दयता से कार्य करने लगते हैं — लालची, निर्दयी, या गुस्सैल होना। और हर बार जब हम वैसे कार्य करते हैं, हम वास्तव में अंदर खुद को चोट पहुँचाते हैं! पर जब तुम सच में हर किसी में वही सुंदर रोशनी देखते हो, तुम निर्दयी होना बंद कर देते हो! तो अद्भुत सबक: तुम लोगों को जिस तरह देखते हो वह बदलता है तुम कैसे कार्य करते हो, और तुम कैसे कार्य करते हो वह बदलता है तुम कौन बनते हो! तो हर किसी में अद्भुत रोशनी देखने का अभ्यास करो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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