अध्याय 9 · श्लोक 4— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
लिप्यंतरण
mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- mayā
- — by me
- tatam
- — pervaded
- idam
- — this
- sarvam
- — entire
- jagat
- — cosmic manifestation
- avyakta-mūrtinā
- — the unmanifested form
- mat-sthāni
- — in me
- sarva-bhūtāni
- — all living beings
- na
- — not
- cha
- — and
- aham
- — I
- teṣhu
- — in them
- avasthitaḥ
- — dwell
भावार्थ
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।
व्याख्या
यह गहन श्लोक कहता है: 'मेरे द्वारा, अपने अव्यक्त रूप में, यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।' श्रीकृष्ण सृष्टि के साथ अपने सम्बन्ध का गहनतम रहस्य प्रकट करना शुरू करते हैं। 'मया ततम् इदं सर्वं जगद् अव्यक्तमूर्तिना' — मेरे द्वारा, अपने अव्यक्त रूप में, यह पूरा जगत् व्याप्त है। 'मत्स्थानि सर्वभूतानि' — सब प्राणी मुझमें स्थित हैं। फिर विरोधाभास: 'न च अहं तेषु अवस्थितः' — पर मैं उनमें स्थित नहीं। शंकराचार्य इस स्पष्ट विरोधाभास को समझाते हैं। यह आकाश की तरह है: आकाश सब वस्तुओं को व्याप्त करता और समाहित करता है, फिर भी आकाश उनसे समाहित या सीमित नहीं। यह सृष्टि के साथ उत्कृष्ट-अंतर्व्यापी दिव्य का सम्बन्ध है। दिव्य हर जगह घनिष्ठ रूप से उपस्थित और सब चीज़ों से पूरी तरह परे दोनों है।
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श्रीकृष्ण एक गहन विरोधाभास नाम करते हैं: दिव्य सब कुछ व्याप्त करता है और सब प्राणी उसके भीतर हैं — फिर भी यह उनमें से किसी से समाहित या सीमित नहीं। जो छवि इसे खोलती है वह आकाश है: आकाश कमरे की हर वस्तु को व्याप्त करता और रखता है, फिर भी कोई वस्तु आकाश को समाहित या सीमित नहीं करती। यह दो सत्यों को एक साथ रखता है जिन्हें हमारे मन अलग करते हैं: पूर्ण निकटता और पूर्ण उत्कृष्टता, एक साथ। सबसे गहरी वास्तविकता एक साथ सबसे घनिष्ठ चीज़ हो सकती है — और पूरी तरह परे भी।
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श्रीकृष्ण एक प्रोफाउंड पैराडॉक्स नेम करते हैं: डिवाइन सब कुछ परवेड करता है, और सब बीइंग्स उसके भीतर हैं — फिर भी यह उनमें से किसी से कंटेन या लिमिटेड नहीं। जो इमेज इसे अनलॉक करती है वह स्पेस है: स्पेस रूम की हर ऑब्जेक्ट को परवेड और होल्ड करता है, फिर भी कोई ऑब्जेक्ट स्पेस को कंटेन नहीं करता। यह दो ट्रुथ्स एक साथ रखता है: अटर नियरनेस AND टोटल ट्रांसेंडेंस। डीपेस्ट रियलिटी एक साथ सबसे इंटिमेट चीज़ हो सकती है — और पूरी तरह बियॉन्ड भी। फुली प्रेज़ेंट, फुली फ्री।
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श्रीकृष्ण एक गहरा, सुंदर रहस्य साझा करते हैं! वे कहते हैं: 'मैं पूरे ब्रह्माण्ड को भरता हूँ, और जो कुछ अस्तित्व में है वह मेरे अंदर है — पर मैं उनमें से किसी में फँसा नहीं हूँ!' एक बड़े कमरे की हवा के बारे में सोचो — यह हर खिलौने और कुर्सी को छूती और घेरती है, उन सबको थामती है। पर खिलौने हवा को नहीं थामते; हवा मुक्त और हर जगह है! उसी तरह, भगवान सब कुछ भरते और थामते हैं, पर भगवान उन सबसे बहुत बड़े और मुक्त हैं!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
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