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अध्याय 13 · श्लोक 22क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 22 / 35

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥

लिप्यंतरण

puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu

शब्दार्थ (अन्वय)

puruṣhaḥ
the individual soul
prakṛiti-sthaḥ
seated in the material energy
hi
indeed
bhuṅkte
desires to enjoy
prakṛiti-jān
produced by the material energy
guṇān
the three modes of nature
kāraṇam
the cause
guṇa-saṅgaḥ
the attachment (to three guṇas)
asya
of its
sat-asat-yoni
in superior and inferior wombs
janmasu
of birth

भावार्थ

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण बंधन का कारण समझाते हैं: 'प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों का अनुभव करता है; गुणों के प्रति आसक्ति अच्छे और बुरे योनियों में उसके जन्म का कारण है।' श्रीकृष्ण समझाते हैं कि चेतन स्व कैसे बँध जाता है। शंकराचार्य बंधन का सटीक तंत्र पहचानते हैं: 'गुणसंग' — गुणों के प्रति आसक्ति। जब चेतन स्व, प्रकृति से पहचाना हुआ, गुणों द्वारा उत्पन्न अनुभवों से आसक्त हो जाता है (सुखों से चिपकते, दुखों से हटते), यह आसक्ति ही उसे बाँधती है। बंधन की जड़ अनुभव स्वयं नहीं, बल्कि अनुभव के प्रति आसक्ति है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि बंधन की जड़ की सटीक पहचान है: यह अनुभव स्वयं नहीं जो हमें फँसाता है, बल्कि अनुभव के प्रति आसक्ति। यह एक महत्त्वपूर्ण और मुक्तिदायक भेद है। आसक्ति जंजीर है, संपर्क नहीं। यह पूरी आध्यात्मिक चुनौती को मुक्तिदायक ढंग से पुनः फ्रेम करता है। लक्ष्य अनुभव होना बंद करना नहीं — लक्ष्य अनुभव के प्रति अपना सम्बन्ध बदलना है। तुम सुखों का स्वाद ले सकते हो बिना बेताबी से चिपके। समस्या कभी तुम्हारे अनुभव नहीं थे — यह उनके प्रति तुम्हारी आसक्ति है। सब कुछ चखो, किसी से मत चिपको।

भगवद्गीता 13.22 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण बंधन का सटीक कारण इंगित करते हैं, और निकालने योग्य अंतर्दृष्टि महत्त्वपूर्ण और मुक्तिदायक है: यह अनुभव स्वयं नहीं जो हमें फँसाता है, बल्कि अनुभव के प्रति आसक्ति। चेतन स्व प्रकृति के गुणों के खेल का अनुभव करने से बँधा नहीं — सुख और दुःख, उतार-चढ़ाव। यह उस खेल से आसक्त होने से बँधा है: सुखों से चिपकते, दुखों से बेताबी से हटते। चिपकना जंजीर है, संपर्क नहीं। यह पूरी आध्यात्मिक चुनौती को मुक्तिदायक ढंग से पुनः फ्रेम करता है। लक्ष्य अनुभव होना बंद करना नहीं — लक्ष्य अनुभव के प्रति अपना सम्बन्ध बदलना है। तुम सुखों का स्वाद ले सकते हो बिना बेताबी से चिपके। समस्या कभी तुम्हारे अनुभव नहीं थे — यह उनके प्रति तुम्हारी आसक्ति है। सब कुछ चखो, किसी से मत चिपको। यही एक जंजीर जीवन और एक सच में स्वतंत्र जीवन के बीच पूरा अंतर है।

भगवद्गीता 13.22 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण बॉन्डेज का प्रिसाइज़ कॉज़ पिनपॉइंट करते हैं, और इनसाइट क्रूशियल और लिबरेटिंग है: यह एक्सपीरियंस खुद नहीं जो हमें ट्रैप करता है, बल्कि एक्सपीरियंस के प्रति ATTACHMENT। कॉन्शियस सेल्फ नेचर के गुणों के प्ले को एक्सपीरियंस करने से बाउंड नहीं — सुख और दुःख, अप्स और डाउन्स। यह उस प्ले से अटैच्ड होने से बाउंड है: सुखों से क्लिंग करते, दुखों से डेस्परेटली रिकॉइल करते। क्लिंगिंग चेन है, कॉन्टैक्ट नहीं। यह पूरी चैलेंज को फ्रीइंग वे में रीफ्रेम करता है। गोल एक्सपीरियंस होना बंद करना नहीं — गोल एक्सपीरियंस के प्रति अपना रिलेशनशिप बदलना है। तुम सुखों का टेस्ट ले सकते हो बिना डेस्परेटली क्लिंग किए। प्रॉब्लम कभी तुम्हारे एक्सपीरियंसेज़ नहीं थे — यह उनके प्रति तुम्हारी अटैचमेंट है। सब कुछ टेस्ट करो, किसी से क्लिंग मत करो।

भगवद्गीता 13.22 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वास्तव में हमें क्या फँसाता है और अस्वतंत्र बनाता है। और यहाँ आश्चर्यजनक उत्तर है: यह अनुभव या भावनाएँ होना नहीं जो हमें फँसाता है — यह उनसे बहुत आसक्त होना, बहुत कसकर पकड़ना है! एक मज़ेदार उदाहरण से समझाता हूँ: कल्पना करो तुम एक खेल के मैदान में सब झूलों का आनंद ले रहे हो। झूलों पर मज़े करना कोई समस्या नहीं! पर अगर तुम एक झूले से इतनी कसकर चिपकते हो कि चिल्लाते और रोते हो और कभी उतरने से इनकार करते हो — वह समस्या बन जाती है! मज़ा ठीक था; बेताब पकड़ ही परेशानी का कारण है! उसी तरह, जीवन के खुश पलों का आनंद लेना ठीक है। जाल तब है जब हम अच्छी चीज़ों से इतनी कसकर चिपकते हैं कि अपना शांत स्व खो देते हैं! तो रहस्य जीवन का आनंद लेना बंद करना नहीं — इसे खुले हाथ से आनंद लेना है! सब कुछ आनंद लो, पर सब हल्के से थामो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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