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अध्याय 13 · श्लोक 20क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 20 / 35

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥

लिप्यंतरण

prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān

शब्दार्थ (अन्वय)

prakṛitim
material nature
puruṣham
the individual souls
cha
and
eva
indeed
viddhi
know
anādī
beginningless
ubhau
both
api
and
vikārān
transformations (of the body)
cha
also
guṇān
the three modes of nature
cha
and
eva
indeed
viddhi
know
prakṛiti
material energy
sambhavān
produced by

भावार्थ

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण प्रकृति और पुरुष प्रस्तुत करते हैं: 'जानो कि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं; और जानो कि विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं।' श्रीकृष्ण अब दो मौलिक सिद्धांतों के बीच सम्बन्ध की ओर मुड़ते हैं। शंकराचार्य मुख्य भेद समझाते हैं। प्रकृति नकृति/पदार्थ का सिद्धांत है — सब बदलते रूपों, विकारों, और तीन गुणों का स्रोत। पुरुष चेतन आत्मा है। यहाँ स्थापित महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि सब परिवर्तन, सब विकार प्रकृति का है — पुरुष का नहीं। आत्मा नहीं बदलती; सब परिवर्तन प्रकृति में होता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह स्पष्ट करने वाली पहचान है कि सब परिवर्तन प्रकृति का है, जबकि तुम्हारा सबसे गहरा स्व अपरिवर्तनीय जागरूकता है। तुम्हारे अनुभव में जो भी बदलता है — तुम्हारा शरीर बूढ़ा होना, तुम्हारे मूड बदलना, तुम्हारे विचार आना-जाना — यह सब 'प्रकृति' का है। पर वह जागरूकता जिसमें यह सब परिवर्तन साक्षी है — वह स्वयं नहीं बदलती। यह गहराई से स्थिर करने वाला है। अपनी सबसे गहरी पहचान किसी भी चीज़ में मत रखो जो बदलती है — बल्कि उस अपरिवर्तनीय जागरूकता में जो इन सबको साक्षी करती है।

भगवद्गीता 13.20 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण प्रकृति (नकृति, सब परिवर्तन का स्रोत) और पुरुष (अपरिवर्तनीय चेतन स्व) प्रस्तुत करते हैं, और निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह स्पष्ट करने वाली पहचान है कि सब परिवर्तन प्रकृति का है, जबकि तुम्हारा सबसे गहरा स्व अपरिवर्तनीय जागरूकता है। विचार करो: तुम्हारे अनुभव में जो भी बदलता है — तुम्हारा शरीर बूढ़ा होना, तुम्हारे मूड बदलना, तुम्हारे विचार आना-जाना, तुम्हारी परिस्थितियाँ उठना-गिरना — यह सब 'प्रकृति' का है। पर वह जागरूकता जिसमें यह सब परिवर्तन साक्षी है — वह सचेत उपस्थिति जो तुम्हारे पूरे जीवन में निरंतर तुम रही — वह स्वयं नहीं बदलती। यह गहराई से स्थिर करने वाला है। हम बहुत पीड़ित होते हैं क्योंकि हम जो बदलता है उससे पहचानते हैं। पर गीता तुम में कुछ ऐसा इशारा करती है जो कभी नहीं बदला। अपनी सबसे गहरी पहचान किसी भी चीज़ में मत रखो जो बदलती है — बल्कि उस अपरिवर्तनीय जागरूकता में जो इन सबको साक्षी करती है।

भगवद्गीता 13.20 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण प्रकृति (नेचर, सब चेंज का सोर्स) और पुरुष (चेंजलेस कॉन्शियस सेल्फ) इंट्रोड्यूस करते हैं, और इनसाइट यह क्लैरिफाइंग रिकग्निशन है कि सब चेंज नेचर का है, जबकि तुम्हारा डीपेस्ट सेल्फ चेंजलेस अवेयरनेस है। कंसिडर करो: तुम्हारे एक्सपीरियंस में जो भी चेंज होता है — तुम्हारी बॉडी एजिंग, तुम्हारे मूड्स शिफ्टिंग, तुम्हारे थॉट्स आना-जाना, तुम्हारी सर्कमस्टैंसेज़ राइज़-फॉल — यह सब 'नेचर' का है। पर वह अवेयरनेस जिसमें यह सब चेंज विटनेस्ड है — वह कॉन्शियस प्रेज़ेंस जो तुम्हारी पूरी लाइफ में कंटिन्युअसली तुम रही — वह खुद चेंज नहीं होती। यह प्रोफाउंडली स्टेडीइंग है। हम इतना सफर करते हैं क्योंकि हम जो चेंज होता है उससे आइडेंटिफाई करते हैं। पर गीता तुम में कुछ पॉइंट करती है जो लिटरली कभी नहीं चेंज हुआ। अपनी डीपेस्ट आइडेंटिटी किसी भी चेंजिंग चीज़ में मत रखो — बल्कि उस चेंजलेस अवेयरनेस में।

भगवद्गीता 13.20 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण दो चीज़ों के बारे में सिखाते हैं: 'प्रकृति' (सब कुछ जो बदलता है) और 'सच्चा स्व' (वह जागरूकता जो देखती है, जो कभी नहीं बदलती)। और यहाँ मुख्य विचार है: सब कुछ जो बदलता है 'प्रकृति' का है — पर असली, सबसे गहरे तुम कभी नहीं बदलते! सोचो: जब से तुम बच्चे थे तुम्हारा शरीर बहुत बदल गया है — तुम बड़े हो गए! तुम्हारी भावनाएँ हर समय बदलती हैं — खुश, फिर उदास। तुम्हारे विचार आते-जाते हैं। वह सब हमेशा बदल रहा है! पर तुम में कुछ है जो कभी नहीं बदला: वह तुम जो जागरूक हो, वह तुम जो शुरू से देख रहे हो! वह जागरूक 'तुम' वही है — यह कभी नहीं बदलता! यह अद्भुत रूप से सुकून देने वाला है: जब तुम्हारे आसपास सब कुछ बदलता है, एक शांत, स्थिर तुम भीतर हमेशा वही रहता है! उस स्थिर, अपरिवर्तनीय तुम में विश्राम करो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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