अध्याय 12 · श्लोक 11— भक्ति योग
Read this verse in English →अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥
लिप्यंतरण
athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān
शब्दार्थ (अन्वय)
- atha
- — if
- etat
- — this
- api
- — even
- aśhaktaḥ
- — unable
- asi
- — you are
- kartum
- — to work
- mad-yogam
- — with devotion to me
- āśhritaḥ
- — taking refuge
- sarva-karma
- — of all actions
- phala-tyāgam
- — to renounce the fruits
- tataḥ
- — then
- kuru
- — do
- yata-ātma-vān
- — be situated in the self
भावार्थ
अगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अंतिम, सबसे सुलभ कदम देते हैं: 'यदि तुम यह भी नहीं कर सकते, तो मेरे योग का आश्रय लेकर, संयमित मन से सब कर्मों के फल का त्याग करो।' श्रीकृष्ण सुलभ अभ्यासों की उतरती सीढ़ी पूरी करते हैं। शंकराचार्य ध्यान देते हैं कि यह सबसे सुलभ सीढ़ी है: भले तुम अपने कर्म सचेत भक्ति से दिव्य को समर्पित न कर सको, तुम कम से कम 'सर्व-कर्म-फल-त्याग' का अभ्यास कर सकते हो — अपने कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति का त्याग। बस जो तुम करते हो उसके परिणामों की पकड़ छोड़ो। यह आधारभूत कर्म योग है (2.47)। श्रीकृष्ण ने अब बिल्कुल सबके लिए एक कदम प्रदान किया है। अंतर्दृष्टि यह है कि सबसे सरल, सबसे आधारभूत अभ्यास भी — परिणामों के प्रति आसक्ति छोड़ना — स्वयं एक पूर्ण और प्रभावी पथ है, बिल्कुल किसी के लिए भी उपलब्ध। परिणामों के प्रति आसक्ति हमारी बहुत सी पीड़ा की जड़ है। और इसे छोड़ना कुछ ऐसा है जिसे कोई भी अभी अभ्यास करना शुरू कर सकता है। अगर उच्चतम अभ्यास पहुँच से बाहर लगें तो हतोत्साहित मत हो। जो तुम कर सकते हो उससे शुरू करो। जहाँ तुम हो वहीं से शुरू करो; द्वार सबके लिए खुला है।
भगवद्गीता 12.11 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण उतरती सीढ़ी को सबसे सुलभ कदम से पूरा करते हैं: अगर बाकी सब तुमसे परे लगे, बस अपने कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति छोड़ो। अंतर्दृष्टि यह है कि यह सबसे सरल अभ्यास भी — परिणामों पर पकड़ छोड़ना — स्वयं एक पूर्ण पथ है, बिल्कुल किसी के लिए भी उपलब्ध। ध्यान दो श्रीकृष्ण ने इस पूरी श्रृंखला में क्या किया (12.8-11): वे पूरी सीढ़ी उतरे, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई बिना करने योग्य कदम के न छूटे। अंतिम, सार्वभौमिक कदम यह है: जो भी तुम करते हो, परिणामों की चिंतित पकड़ छोड़ो। परिणामों के प्रति आसक्ति हमारी बहुत सी पीड़ा की जड़ है। और इसे छोड़ना कुछ ऐसा है जिसे कोई भी अभी शुरू कर सकता है। अगर उच्चतम अभ्यास पहुँच से बाहर लगें तो कभी हतोत्साहित मत हो। जो तुम कर सकते हो उससे शुरू करो। द्वार सबके लिए खुला है।
भगवद्गीता 12.11 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण डिसेंडिंग लैडर को सबसे एक्सेसिबल स्टेप से कम्प्लीट करते हैं: अगर बाकी सब तुमसे परे फील हो, बस अपने एक्शन्स के फ्रूट्स के प्रति अटैचमेंट छोड़ो। इनसाइट यह है कि यह सिंपलेस्ट प्रैक्टिस भी — आउटकम्स पर ग्रिप रिलीज़ करना — खुद एक कम्प्लीट पाथ है, बिल्कुल किसी के लिए भी अवेलेबल। नोटिस करो श्रीकृष्ण ने इस पूरी सीक्वेंस में क्या किया (12.8-11): वे पूरी लैडर डिसेंड हुए, यह श्योर करते हुए कि NO ONE बिना डूएबल स्टेप के न छूटे। फाइनल स्टेप: जो भी तुम करते हो, रिज़ल्ट्स की एंग्ज़ियस ग्रास्पिंग रिलीज़ करो। आउटकम्स के प्रति अटैचमेंट हमारी बहुत सी सफरिंग की रूट है। इसे छोड़ना कोई भी अभी शुरू कर सकता है। जहाँ तुम हो वहीं से शुरू करो। डोर सबके लिए खुला है।
भगवद्गीता 12.11 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण बिल्कुल अंतिम और आसान कदम देते हैं, ताकि बिल्कुल हर किसी के पास एक पथ हो: 'अगर तुम यह भी नहीं कर सकते, तो बस जो तुम करते हो उसके परिणामों की चिंता छोड़ो!' यह सबसे सरल कदम है, और कोई भी कर सकता है! इसका मतलब: चीज़ों में अपना सर्वश्रेष्ठ करो, पर इस बारे में तनावग्रस्त मत हो कि वे कैसे निकलती हैं। बस परिणामों की चिंता छोड़ो! यह इतना शक्तिशाली क्यों है: हमारी बहुत सी नाखुशी परिणामों के बारे में बहुत चिंतित होने से आती है — 'क्या मैं जीतूँगा? क्या यह परफेक्ट निकलेगा?' वह सब पकड़ना हमें चिंतित बनाता है! पर जब तुम बस अपना सर्वश्रेष्ठ करते हो और परिणाम से चिपकना छोड़ते हो, तुम मुक्त महसूस करते हो! और देखो श्रीकृष्ण कितने दयालु हैं — उन्होंने हर किसी के लिए एक पथ दिया! कोई नहीं छूटता! आज ही शुरू करो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण सगुण भक्ति को सरलतम और निश्चित मार्ग बताते हैं। वे विभिन्न साधकों हेतु क्रमिक साधन और उन गुणों का वर्णन करते हैं जिनसे भक्त उन्हें प्रिय होता है।
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