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अध्याय 9 · श्लोक 21राजविद्या राजगुह्य योग

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श्लोक 21 / 34

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥

लिप्यंतरण

te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante

शब्दार्थ (अन्वय)

te
they
tam
that
bhuktvā
having enjoyed
swarga-lokam
heaven
viśhālam
vast
kṣhīṇe
at the exhaustion of
puṇye
stock of merits
martya-lokam
to the earthly plane
viśhanti
return
evam
thus
trayī dharmam
the karm-kāṇḍ portion of the three Vedas
anuprapannāḥ
follow
gata-āgatam
repeated coming and going
kāma-kāmāḥ
desiring objects of enjoyments
labhante
attain

भावार्थ

वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।

व्याख्या

"ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति, एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।" — विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य क्षीण होने पर, वे मर्त्यलोक में लौटते हैं। इस प्रकार तीन वेदों के धर्म का अनुसरण करते, इच्छाओं की इच्छा करने वाले, आना-जाना पाते हैं। श्रीकृष्ण 9.20 में वर्णित स्वर्ग-खोजी पथ की कमी प्रकट करते हैं। 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालम्' — उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर — 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' — पुण्य क्षीण होने पर, वे मर्त्यलोक में लौटते हैं। शंकराचार्य मुख्य वाक्यांश 'गतागतम्' निकालते हैं — जाना और आना, राउंड ट्रिप। यह सब इच्छा-चालित पूजा का भाग्य है: अस्थायी पुरस्कार पाने और फिर खोने का स्थायी चक्र। यह श्लोक केवल अस्थायी पुरस्कारों का लक्ष्य रखने की निरर्थकता को घर तक पहुँचाता है। उस एक लक्ष्य के लिए लक्ष्य रखो जो चक्र समाप्त करता है।

भगवद्गीता 9.21 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण मुख्य शब्द देते हैं: 'गतागतम्' — आना और जाना, अंतहीन राउंड ट्रिप। जो केवल अस्थायी पुरस्कारों का लक्ष्य रखते हैं उन्हें ठीक वही मिलता है: वे प्राप्त करते हैं, भोगते हैं, पुरस्कार चुक जाता है, वे वापस वहीं जहाँ शुरू किया, और पूरा चक्र दोहराता है। यह एक गहराई से परिचित आधुनिक अनुभव वर्णित करता है — हेडोनिक ट्रेडमिल। तुम लक्ष्य का पीछा करते हो, पाते हो, संक्षेप में आनंद लेते हो, आनंद फीका पड़ता है, और तुम वापस अगली चीज़ चाहते हो। यह प्रगति जैसा लगता है पर यह वास्तव में एक राउंड ट्रिप है। बाहर निकलने का रास्ता पुरस्कारों का अधिक पीछा करना नहीं — यह किसी ऐसी चीज़ की ओर उन्मुख होना है जो नहीं चुकती।

भगवद्गीता 9.21 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण की वर्ड देते हैं: 'गतागतम्' — कमिंग और गोइंग, एंडलेस राउंड ट्रिप। जो केवल टेम्पररी रिवॉर्ड्स एम करते हैं उन्हें बिल्कुल वही मिलता है: वे अटेन करते हैं, एंजॉय करते हैं, रिवॉर्ड रन आउट होता है, वे वापस वहीं, और पूरा साइकिल रिपीट। नो फाइनल अराइवल — बस एक एग्ज़हॉस्टिंग लूप। यह मॉडर्न एक्सपीरियंस डिस्क्राइब करता है: हेडोनिक ट्रेडमिल। तुम गोल चेज़ करते हो, पाते हो, हाई ब्रीफली एंजॉय करते हो, हाई फेड होता है, और तुम वापस नेक्स्ट चीज़ क्रेव करते हो। ट्रेडमिल की कोई फिनिश लाइन नहीं। उससे स्टेप ऑफ करो।

भगवद्गीता 9.21 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण केवल स्वर्गीय पुरस्कार खोजने की कमी प्रकट करते हैं: एक बार जब तुम उन अद्भुत स्वर्गीय सुखों का आनंद लेते हो और तुम्हारे 'अच्छे अंक' उपयोग हो जाते हैं, तुम फिर साधारण दुनिया में वापस आ जाते हो! श्रीकृष्ण इसे 'आना-जाना' कहते हैं — बिना अंतिम घर के एक राउंड ट्रिप जैसा। यह एक मेरी-गो-राउंड पर सवारी जैसा है: तुम ऊपर-नीचे, गोल-गोल जाते हो, पर कभी किसी नई जगह नहीं पहुँचते! सबक: हमेशा चुकने वाले पुरस्कारों का पीछा करने के बजाय, सबसे बड़े लक्ष्य के लिए पहुँचो — भगवान के साथ टिकाऊ खुशी जो कभी समाप्त नहीं होती!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।

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