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अध्याय 9 · श्लोक 14राजविद्या राजगुह्य योग

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श्लोक 14 / 34

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥

लिप्यंतरण

satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate

शब्दार्थ (अन्वय)

satatam
always
kīrtayantaḥ
singing divine glories
mām
me
yatantaḥ
striving
cha
and
dṛiḍha-vratāḥ
with great determination
namasyantaḥ
humbly bowing down
cha
and
mām
me
bhaktyā
loving devotion
nitya-yuktāḥ
constantly united
upāsate
worship

भावार्थ

नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं।

व्याख्या

"सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः, नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।" — सदा मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत से प्रयास करते हुए, भक्ति से मुझे नमन करते हुए, नित्य युक्त होकर, वे मेरी उपासना करते हैं। श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि 9.13 की महान आत्माएँ अपनी भक्ति व्यवहार में कैसे जीती हैं। कई सुंदर तत्त्व नामित हैं। 'सततं कीर्तयन्तः माम्' — सदा मेरा गुणगान करते हुए। 'यतन्तः च दृढव्रताः' — दृढ़ व्रत से प्रयास करते हुए। 'नमस्यन्तः च मां भक्त्या' — भक्ति से मुझे नमन करते हुए। 'नित्ययुक्ता उपासते' — नित्य युक्त होकर, वे उपासना करते हैं। शंकराचार्य इस भक्ति की पूर्णता पर ध्यान देते हैं: यह वाणी, इच्छा, शरीर और हृदय, और निरंतरता को संलग्न करती है। यह व्यवहार में पूर्ण-हृदय आध्यात्मिक जीवन कैसा दिखता है।

भगवद्गीता 9.14 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण दिखाते हैं कि वास्तविक अभ्यास में पूर्ण-हृदय भक्ति कैसी दिखती है — और ध्यान दो यह केवल एक अस्पष्ट भावना नहीं। यह पूरे अस्तित्व को संलग्न करती है: शब्द (निरंतर स्मरण), इच्छा (स्थिर अनुशासित प्रयास), शरीर और हृदय (विनम्र श्रद्धा), और निरंतरता। गहरा सिद्धांत: किसी भी योग्य चीज़ के प्रति वास्तविक भक्ति पूर्ण और निरंतर है, कभी-कभार और आधे-अधूरे नहीं। जिसके भी प्रति तुम सच में समर्पित हो, वास्तविक भक्ति उसी तरह दिखती है। जो चीज़ें तुम्हें रूपांतरित करती हैं वे वे हैं जिन्हें तुम अपना पूरा, निरंतर, विनम्र, अनुशासित स्व देते हो।

भगवद्गीता 9.14 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण दिखाते हैं प्रैक्टिस में होलहार्टेड डिवोशन एक्चुअली कैसी दिखती है — और नोटिस करो यह सिर्फ वेग फीलिंग नहीं। यह WHOLE बीइंग को एंगेज करती है: वर्ड्स (कंटिन्युअल रिमेम्बरिंग), विल (स्टेडी डिसिप्लिन्ड एफर्ट), बॉडी और हार्ट (हम्बल रेवरेंस), और कॉन्स्टेंसी। डीपर प्रिंसिपल: किसी भी वर्दी चीज़ के प्रति जेन्युइन डिवोशन होल-बॉडीड और कंटिन्युअस है। जिसके भी प्रति तुम सच में डिवोटेड हो, रियल डिवोशन उसी तरह दिखती है। जो चीज़ें तुम्हें ट्रांसफॉर्म करती हैं वे वे हैं जिन्हें तुम अपना पूरा, कंटिन्युअस, हम्बल सेल्फ देते हो।

भगवद्गीता 9.14 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि महान आत्माएँ हर दिन भगवान के लिए अपना प्रेम कैसे दिखाती हैं! वे चार सुंदर चीज़ें करती हैं: वे भगवान का गुणगान करती हैं और भगवान को हमेशा अपने विचारों में रखती हैं, वे दृढ़ संकल्प से अपना सर्वश्रेष्ठ करती रहती हैं, वे विनम्र सम्मान से नमन करती हैं, और वे यह सब लगातार, हर समय करती हैं! देखो कैसे उनका प्रेम बस एक भावना नहीं — यह कुछ ऐसा है जो वे अपने शब्दों, प्रयास, शरीर और हृदय से करती हैं, सब एक साथ! यही वास्तविक, पूरे दिल का प्रेम दिखता है!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।

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