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अध्याय 7 · श्लोक 27ज्ञान विज्ञान योग

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श्लोक 27 / 30

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥

लिप्यंतरण

ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata sarva-bhūtāni sammohaṁ sarge yānti parantapa

शब्दार्थ (अन्वय)

ichchhā
desire
dveṣha
aversion
samutthena
arise from
dvandva
of duality
mohena
from the illusion
bhārata
Arjun, descendant of Bharat
sarva
all
bhūtāni
living beings
sammoham
into delusion
sarge
since birth
yānti
enter
parantapa
Arjun, conqueror of enemies

भावार्थ

हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं।

व्याख्या

"इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत, सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।" — हे भारत, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्व के मोह से, सब प्राणी जन्म के समय बेसुध हो जाते हैं, हे परंतप। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि प्राणी क्यों मोहित हैं और उन्हें नहीं जान पाते। मोह का स्रोत है 'द्वन्द्वमोह' — विपरीत जोड़ियों (द्वंद्वों: सुख/दुख, लाभ/हानि) से उत्पन्न बेसुधी। और ये जोड़ियाँ 'इच्छाद्वेषसमुत्थ' से उठती हैं — इच्छा और द्वेष से। शंकराचार्य क्रियाविधि का सटीक पता लगाते हैं: इच्छा (सुखद चाहना) और द्वेष (अप्रिय अस्वीकार) की मूल गतिविधियों से अनुभव के सब द्वंद्व उठते हैं। आकर्षण और प्रतिकर्षण के बीच फँसा, मन सदा विपरीत दिशाओं में खिंचता है। यह मोह जन्म के क्षण से ही 'सर्वभूतानि सर्गे' को जकड़ता है। यह श्लोक आध्यात्मिक अंधेपन की मनोवैज्ञानिक जड़ को इंगित करता है।

भगवद्गीता 7.27 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण हमारे भ्रम की मनोवैज्ञानिक जड़ को इंगित करते हैं: इच्छा और द्वेष का निरंतर धक्का-खिंचाव — 'मैं यह चाहता हूँ / मैं वह नहीं चाहता' — सब द्वंद्व उत्पन्न करता है जो हमें बेसुध करते हैं, और यह जन्म से हमें जकड़ता है। यह उल्लेखनीय रूप से सटीक है। ध्यान दो तुम्हारे मानसिक जीवन का कितना हिस्सा ठीक यही है: जो चाहते हो उसकी ओर खिंचना, जो नहीं चाहते उसे धकेलना। यह निरंतर प्रतिक्रियाशीलता इतनी स्थिर है कि हम इसे देखते भी नहीं। व्यावहारिक सबक: स्पष्टता इस मूल पैटर्न को अपने में देखने से शुरू होती है।

भगवद्गीता 7.27 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण हमारे कन्फ्यूज़न की साइकोलॉजिकल ROOT इंगित करते हैं: डिज़ायर और एवर्ज़न का कॉन्स्टेंट पुश-पुल — 'मैं यह चाहता हूँ / मैं वह नहीं चाहता' — सब ड्युअलिटीज़ जनरेट करता है जो हमें बेविल्डर करती हैं, और यह जन्म से हमें ग्रिप करता है। यह रिमार्केबली प्रिसाइज़ है। नोटिस करो तुम्हारी मेंटल लाइफ का कितना हिस्सा लिटरली यही है। यह रिएक्टिविटी इतनी कॉन्स्टेंट है कि हम इसे देखते भी नहीं। टेकअवे: क्लैरिटी इस पैटर्न को अपने में नोटिस करने से स्टार्ट होती है।

भगवद्गीता 7.27 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जन्म से ही सबको क्या भ्रमित करता है: हम हमेशा दो तरफ खिंचते हैं — जो चीज़ें हमें पसंद हैं उन्हें चाहना और जो पसंद नहीं उन्हें धकेलना! यह निरंतर 'मैं यह चाहता हूँ, मैं वह नहीं चाहता' की रस्साकशी हमारे मन को भ्रमित करती है और हमें स्पष्ट देखने से रोकती है! यह उस पानी में शांत प्रतिबिंब देखने की कोशिश जैसा है जिसमें हमेशा छींटे पड़ते रहते हैं! स्पष्ट देखने का पहला कदम बस यह देखना है कि यह तुम्हारे अंदर हो रहा है!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी पराा और अपरा प्रकृति, समस्त सृष्टि में अपनी व्याप्ति, चार प्रकार के भक्त, तथा माया द्वारा सत्य के आवरण का वर्णन करते हैं।

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