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अध्याय 7 · श्लोक 2ज्ञान विज्ञान योग

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श्लोक 2 / 30

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥

लिप्यंतरण

jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam-avaśhiṣhyate

शब्दार्थ (अन्वय)

jñānam
knowledge
te
unto you
aham
I
sa
with
vijñānam
wisdom
idam
this
vakṣhyāmi
shall reveal
aśheṣhataḥ
in full
yat
which
jñātvā
having known
na
not
iha
in this world
bhūyaḥ
further
anyat
anything else
jñātavyam
to be known
avaśhiṣhyate
remains

भावार्थ

तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा।

व्याख्या

"ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः, यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।" — मैं तुम्हें यह ज्ञान विज्ञान सहित पूर्णतः कहूँगा, जिसे जानकर यहाँ और कुछ जानने को शेष नहीं रहता। श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि वे क्या सिखाने वाले हैं: 'ज्ञानं सविज्ञानम्' — ज्ञान विज्ञान सहित। शंकराचार्य महत्त्वपूर्ण भेद खींचते हैं: ज्ञान सत्य की सैद्धांतिक समझ है; विज्ञान इसका प्रत्यक्ष, अनुभवात्मक बोध है। श्रीकृष्ण दोनों का वादा करते हैं। वे इसे 'अशेषतः' कहेंगे — पूर्णतः, बिना शेष। और परिणाम सबसे व्यापक वादा है: 'यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते' — जिसे जानकर और कुछ जानने को शेष नहीं रहता। यह यह दावा है कि यह ज्ञान परम ज्ञान है। जब कोई परम वास्तविकता को प्रत्यक्ष जानता है — सबका आधार और स्रोत — उसने हर चीज़ का सार जान लिया है।

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श्रीकृष्ण दो चीज़ें एक साथ वादा करते हैं: ज्ञान (समझ) और विज्ञान (प्रत्यक्ष बोध) — केवल सिद्धांत नहीं बल्कि जीया हुआ अनुभव। यह भेद बहुत मायने रखता है। हम सूचना-संतृप्त युग में जीते हैं जहाँ हम अनगिनत चीज़ों के 'बारे में जानते' हैं बिना वास्तव में किसी को साकार किए। तुम तैराकी पर हर किताब पढ़ सकते हो और फिर भी डूब सकते हो। यह वह बोध है जो सब जानना पूरा करता है।

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श्रीकृष्ण दो चीज़ें एक साथ प्रॉमिस करते हैं: ज्ञान (अंडरस्टैंडिंग) और विज्ञान (डायरेक्ट रियलाइज़ेशन) — सिर्फ थ्योरी नहीं बल्कि लिव्ड एक्सपीरियंस। यह डिस्टिंक्शन बड़ा है। हम इन्फो-सैचुरेटेड एज में जीते हैं जहाँ हम हज़ार चीज़ों के 'बारे में जानते' हैं बिना किसी को रियलाइज़ किए। तुम स्विमिंग पर हर बुक पढ़ सकते हो और फिर भी डूब सकते हो। यह वह नोइंग है जो सब नोइंग कम्प्लीट करती है।

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श्रीकृष्ण एक रोमांचक वादा करते हैं! वे कहते हैं: 'मैं तुम्हें पूर्ण ज्ञान और इसका गहरा अनुभव सिखाऊँगा — और एक बार जब तुम यह जान लोगे, तो और कुछ सीखने को शेष नहीं रहेगा!' वाह! यह सबसे महत्त्वपूर्ण ज्ञान है। यह वह एक बड़ा रहस्य सीखने जैसा है जो बाकी सब कुछ समझने में मदद करता है! श्रीकृष्ण केवल याद करने के लिए तथ्य नहीं देंगे — वे ऐसा ज्ञान साझा करेंगे जो तुम महसूस कर सकते हो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी पराा और अपरा प्रकृति, समस्त सृष्टि में अपनी व्याप्ति, चार प्रकार के भक्त, तथा माया द्वारा सत्य के आवरण का वर्णन करते हैं।

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