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अध्याय 6 · श्लोक 8आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 8 / 47

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥

लिप्यंतरण

jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥ yukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

jñāna
knowledge
vijñāna
realized knowledge, wisdom from within
tṛipta ātmā
one fully satisfied
kūṭa-sthaḥ
undisturbed
vijita-indriyaḥ
one who has conquered the senses
yuktaḥ
one who is in constant communion with the Supreme
iti
thus
uchyate
is said
yogī
a yogi
sama
looks equally
loṣhṭra
pebbles
aśhma
stone
kāñchanaḥ
gold

भावार्थ

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है -- ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।

व्याख्या

"ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः, युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।" — जिसका आत्मा ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो अविचल है, जिसने इन्द्रियाँ जीत लीं, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं — वह योगी युक्त कहलाता है। श्रीकृष्ण चार लक्षणों से साकार योगी का चित्र बनाते हैं। पहला, 'ज्ञानविज्ञानतृप्त' — ज्ञान और प्रत्यक्ष अनुभूति से तृप्त। शंकराचार्य ज्ञान (शास्त्रीय/बौद्धिक जानना) को विज्ञान (प्रत्यक्ष अनुभवात्मक अनुभूति) से अलग करते हैं। दूसरा, 'कूटस्थ' — अविचल, परिवर्तन के बीच अपरिवर्तनीय। तीसरा, 'विजितेन्द्रिय' — जिसने इन्द्रियाँ जीत लीं। प्रभावशाली चौथा लक्षण: 'समलोष्टाश्मकाञ्चन' — जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं। यह भौतिक अंतरों के प्रति शाब्दिक अंधापन नहीं बल्कि मूल्यांकन की आंतरिक समानता है।

भगवद्गीता 6.8 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

योगी के संतोष का स्रोत ध्यान दो: यह आंतरिक है (ज्ञान और अनुभूति), बाहरी नहीं। क्योंकि पूर्णता भीतर से आती है, सोना और पत्थर सचमुच समान महसूस होते हैं — इसलिए नहीं कि योगी उनका बाज़ार मूल्य नकारता है बल्कि इसलिए कि कोई भी उनकी आंतरिक अवस्था नहीं हिलाता। हमारी अधिकांश चिंता अपने आत्म-मूल्य को अपनी सम्पत्ति को आउटसोर्स करने से आती है।

भगवद्गीता 6.8 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

योगी का कंटेंटमेंट INSIDE से सोर्स्ड है — नॉलेज प्लस डायरेक्ट रियलाइज़ेशन — पॉज़ेशन्स से नहीं। इसलिए सोना और एक रैंडम पत्थर उन्हें सचमुच समान फील होते हैं: यह नकारना नहीं कि मार्केट में सोना ज़्यादा वर्थ है, पर कोई भी उनकी इनर स्टेट नहीं मूव करता। हमारी अधिकांश एंग्ज़ायटी = अपनी सेल्फ-वर्थ को सामान को आउटसोर्स करना।

भगवद्गीता 6.8 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

एक सच्चा योगी अपनी बुद्धि के कारण अंदर से पूरी तरह खुश और भरा हुआ महसूस करता है — इतना कि सोना और एक साधारण पत्थर उन्हें समान लगते हैं! वे फैंसी महँगी चीज़ों से प्रभावित नहीं होते और साधारण चीज़ों से परेशान नहीं होते। उनकी खुशी अंदर से आती है, विशेष सामान रखने से नहीं।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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