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अध्याय 6 · श्लोक 7आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 7 / 47

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥

लिप्यंतरण

jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

jita-ātmanaḥ
one who has conquered one’s mind
praśhāntasya
of the peaceful
parama-ātmā
God
samāhitaḥ
steadfast
śhīta
in cold
uṣhṇa
heat
sukha
happiness
duḥkheṣhu
and distress
tathā
also
māna
in honor
apamānayoḥ
and dishonor

भावार्थ

जिसने अपने-आपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।

व्याख्या

"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः, शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।" — जिसने मन जीत लिया और जो प्रशान्त है, उसके लिए परमात्मा शीत-उष्ण, सुख-दुःख, मान-अपमान में स्थिर रहता है। श्रीकृष्ण पूर्ववर्ती श्लोकों में सिखाई आत्म-महारत का फल वर्णित करते हैं। 'जितात्मा' — जिसका मन जीता गया — और जो इसलिए 'प्रशान्त' — गहराई से शांत — है, उसके लिए परमात्मा 'समाहित,' स्थिर रूप से स्थापित, जागरूकता में सदा-उपस्थित रहता है। ऐसा व्यक्ति द्वंद्वों की झूलती जोड़ियों की परवाह किए बिना आत्मा में स्थित रहता है। शंकराचार्य बल देते हैं कि द्वंद्वों के सामने यह स्थिरता उस व्यक्ति का स्वाभाविक चिह्न है जिसमें आत्मा साकार है। ऐसा नहीं कि योगी ठंड या दर्द महसूस करना बंद कर देता है; यह कि ये अब अंतर्निहित संतुलन को विचलित नहीं करते।

भगवद्गीता 6.7 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

सच्ची आंतरिक स्थिरता कठिनाई की अनुपस्थिति नहीं है — यह वह स्थिरता है जो कठिनाई के बीच टिकती है। श्रीकृष्ण तीन क्षेत्र गिनाते हैं जहाँ हममें से अधिकांश टूट जाते हैं: शारीरिक असुविधा, भावनात्मक उतार-चढ़ाव, और सामाजिक स्वीकृति/अस्वीकृति। वह शांति जो केवल तब टिकती है जब तुम आरामदायक, खुश और प्रशंसित हो वह अभी सच्ची शांति नहीं है। असली चीज़ ठंड और गर्मी, जीत और हार दोनों में स्थिर रहती है।

भगवद्गीता 6.7 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

रियल इनर स्टेबिलिटी वह वाइब नहीं जो सिर्फ गुड डेज़ पर काम करे। श्रीकृष्ण तीन जगहें नाम करते हैं जहाँ हम सब क्रैक करते हैं: फिज़िकल डिसकम्फर्ट, इमोशनल हाई/लो, और प्रेज़ बनाम रोस्ट। अगर तुम्हारी शांति तुम्हारे ठंडे, उदास या क्रिटिसाइज़ होते ही गायब हो जाती है — वह अभी रियल काम नहीं, बस कम्फर्ट है। जेन्युइन वर्ज़न सब के बीच स्थिर रहता है।

भगवद्गीता 6.7 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

जब कोई सच में अपने मन पर महारत हासिल कर लेता है और गहराई से शांत हो जाता है, वे चाहे कुछ भी हो शांत रहते हैं — चाहे ठंड हो या गर्मी, खुशी हो या दुख, चाहे लोग उनकी प्रशंसा करें या बुरी बातें कहें! उनके अंदर की शांति नहीं हिलती। वे अभी भी चीज़ें महसूस करते हैं, पर गहराई में स्थिर रहते हैं।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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