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अध्याय 6 · श्लोक 34आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 34 / 47

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

लिप्यंतरण

chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram

शब्दार्थ (अन्वय)

chañchalam
restless
hi
certainly
manaḥ
mind
kṛiṣhṇa
Shree Krishna
pramāthi
turbulent
bala-vat
strong
dṛiḍham
obstinate
tasya
its
aham
I
nigraham
control
manye
think
vāyoḥ
of the wind
iva
like
su-duṣhkaram
difficult to perform

भावार्थ

क्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।

व्याख्या

"चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्, तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।" — हे कृष्ण, मन तो वास्तव में चंचल है — प्रमथनकारी, बलवान और दृढ़। इसका निग्रह मैं वायु के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ। अर्जुन अपनी आपत्ति को सब आध्यात्मिक साहित्य में अनियंत्रित मन के सबसे जीवंत और सटीक वर्णनों में से एक के साथ विस्तृत करता है। वह चार गुण नाम करता है: 'चञ्चलम्' — बेचैन; 'प्रमाथि' — प्रमथनकारी, इन्द्रियों और शरीर को भी मथने वाला; 'बलवत्' — शक्तिशाली; 'दृढम्' — हठी, जिद्दी। फिर अविस्मरणीय उपमा: मन को नियंत्रित करना 'वायोरिव सुदुष्करम्' — वायु के समान कठिन। जैसे कोई मुट्ठी में हवा नहीं पकड़ सकता, मन को स्थिर रखना असम्भव लगता है। शंकराचार्य ध्यान देते हैं कि अर्जुन का वर्णन पूरी तरह सटीक है। गीता कठिनाई को खारिज नहीं करती।

भगवद्गीता 6.34 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यह किसी के लिए अध्याय का सबसे मान्यता देने वाला श्लोक है जिसने ध्यान करने में संघर्ष किया है। अर्जुन मन का पूरी तरह वर्णन करता है: बेचैन, प्रमथनकारी, शक्तिशाली, जिद्दी — और वायु के समान नियंत्रित करना कठिन। दुनिया का सबसे महान आध्यात्मिक ग्रंथ स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि मन को वश में करना अविश्वसनीय रूप से कठिन है। तो अगर तुम्हारा मन जंगली महसूस होता है — तुम विफल नहीं हो रहे। कठिनाई वास्तविक और सार्वभौमिक है।

भगवद्गीता 6.34 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

यह चैप्टर का सबसे वैलिडेटिंग श्लोक है किसी के लिए जिसने मेडिटेट करने में स्ट्रगल किया है। अर्जुन माइंड को परफेक्टली नेल करता है: रेस्टलेस, टर्बुलेंट, पावरफुल, ज़िद्दी — और विंड जितना कंट्रोल करना मुश्किल। पृथ्वी का सबसे महान स्पिरिचुअल टेक्स्ट फ्लैटली एडमिट करता है माइंड को टेम करना इनक्रेडिबली हार्ड है। तो अगर तुम्हारा माइंड फेरल हो जाता है — तुम फेल नहीं हो रहे। स्ट्रगल रियल और यूनिवर्सल है।

भगवद्गीता 6.34 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

अर्जुन मन का वर्णन ऐसे तरीके से करता है जिसे हम सब समझते हैं! वह कहता है मन बेचैन, जंगली, बहुत मज़बूत और जिद्दी है — और इसे नियंत्रित करने की कोशिश हवा को हाथों में पकड़ने जितनी कठिन है! क्या तुमने कभी अपने मन को सोचना बंद कराने की कोशिश की और वह बस नहीं रुका? महान योद्धा अर्जुन ने भी ऐसा महसूस किया! पर चिंता मत करो — श्रीकृष्ण इसे वश में करने का रहस्य साझा करने वाले हैं!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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