अध्याय 6 · श्लोक 31— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →गीता 6.31 योग को भक्ति से जोड़ती है: जो योगी एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में उपस्थित दिव्यता की उपासना करता है, वह दिव्यता में बसता है, उसकी बाहरी जीवनशैली चाहे जो हो। हर किसी में पवित्र को देखना स्वयं उसमें जीने का ढंग है।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
लिप्यंतरण
sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvam āsthitaḥ sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate
शब्दार्थ (अन्वय)
- sarva-bhūta-sthitam
- — situated in all beings
- yaḥ
- — who
- mām
- — me
- bhajati
- — worships
- ekatvam
- — in unity
- āsthitaḥ
- — established
- sarvathā
- — in all kinds of
- varta-mānaḥ
- — remain
- api
- — although
- saḥ
- — he
- yogī
- — a yogi
- mayi
- — in me
- vartate
- — dwells
भावार्थ
मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है।
व्याख्या
"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः, सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।" — एकत्व में स्थित जो योगी सब प्राणियों में स्थित मुझको भजता है — वह योगी कैसे भी रहता हुआ मुझमें ही रहता है। श्रीकृष्ण 6.29-30 की दृष्टि को भक्ति (भजति — पूजता, प्रेम करता, सेवा करता) के साथ स्पष्ट रूप से जोड़कर गहरा करते हैं। साकार योगी, 'एकत्वमास्थितः' — एकता की पहचान में स्थित — सब प्राणियों में उपस्थित दिव्य की पूजा करता है। सबमें एक आत्मा देखना ठंडा दार्शनिक अमूर्तन नहीं; यह उस आत्मा की प्रेमपूर्ण पूजा में खिलता है। उल्लेखनीय आश्वासन: 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' — ऐसा योगी कैसे भी रहे, वह मुझमें रहता है। शंकराचार्य 'सर्वथा' (हर तरह से) पर बल देते हैं।
भगवद्गीता 6.31 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
यहाँ मुक्तिदायक हिस्सा है: एक बार जब तुम सब प्राणियों में दिव्य को सच में देखते हो और उस प्रेमपूर्ण पहचान के साथ जीते हो, तुम उस सम्बन्ध में रहते हो चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो। 'आध्यात्मिक समय' और 'सामान्य समय' के बीच कोई अलगाव नहीं। चाहे तुम काम कर रहे हो, खा रहे हो, या आराम कर रहे हो, सम्बन्ध बना रहता है — क्योंकि यह तुम्हारे देखने के तरीके में जड़ा है। जब दृष्टि वास्तविक है, सारा जीवन अभ्यास बन जाता है।
भगवद्गीता 6.31 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
यहाँ फ्रीइंग हिस्सा है: एक बार जब तुम सब बीइंग्स में डिवाइन को सच में देखते हो और उस लविंग रिकग्निशन के साथ जीते हो, तुम कनेक्टेड रहते हो चाहे कुछ भी कर रहे हो। 'स्पिरिचुअल टाइम' और 'नॉर्मल लाइफ' के बीच कोई स्प्लिट नहीं। चाहे तुम काम कर रहे हो, खा रहे हो, या चिल कर रहे हो — कनेक्शन होल्ड करता है। जब विज़न रियल है, तुम्हारी पूरी लाइफ ही प्रैक्टिस है।
भगवद्गीता 6.31 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत साझा करते हैं: एक योगी जो सब प्राणियों के अंदर एक भगवान को देखता है, और प्यार से उसका सम्मान करता है — वह चाहे कुछ भी कर रहा हो भगवान से जुड़ा रहता है! चाहे वे खेल रहे हों, खा रहे हों, पढ़ रहे हों, या आराम कर रहे हों, वे हमेशा दिव्य के करीब हैं। तुम्हें भगवान के साथ रहने के लिए किसी विशेष जगह चुपचाप बैठने की ज़रूरत नहीं!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 6.31 का अर्थ क्या है?
जो योगी एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में बसी दिव्यता की उपासना करता है, वह दिव्यता में बसता है, उसकी जीवनशैली चाहे जो हो। हर किसी में पवित्र को देखना और आदर देना स्वयं उसमें जीने का ढंग है।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, छठे अध्याय (ध्यान योग) में, एकत्व की दृष्टि को भक्ति से जोड़ते हुए।
गीता 6.31 आज के जीवन में कैसे उतारें?
हर व्यक्ति को पवित्र का पात्र मानना साधारण मेल-जोल को उपासना का रूप बना देता है। तुम्हें विशेष परिस्थितियों की ज़रूरत नहीं — देखने का यह ढंग कहीं भी जिया जा सकता है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 6.31 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 6.31 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
ISKCON
ISKCON — Krishna devotional tradition in the Gaudiya Vaishnava lineage.
ISKCON →