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अध्याय 6 · श्लोक 31आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 31 / 47

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥

लिप्यंतरण

sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvam āsthitaḥ sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate

शब्दार्थ (अन्वय)

sarva-bhūta-sthitam
situated in all beings
yaḥ
who
mām
me
bhajati
worships
ekatvam
in unity
āsthitaḥ
established
sarvathā
in all kinds of
varta-mānaḥ
remain
api
although
saḥ
he
yogī
a yogi
mayi
in me
vartate
dwells

भावार्थ

मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है।

व्याख्या

"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः, सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।" — एकत्व में स्थित जो योगी सब प्राणियों में स्थित मुझको भजता है — वह योगी कैसे भी रहता हुआ मुझमें ही रहता है। श्रीकृष्ण 6.29-30 की दृष्टि को भक्ति (भजति — पूजता, प्रेम करता, सेवा करता) के साथ स्पष्ट रूप से जोड़कर गहरा करते हैं। साकार योगी, 'एकत्वमास्थितः' — एकता की पहचान में स्थित — सब प्राणियों में उपस्थित दिव्य की पूजा करता है। सबमें एक आत्मा देखना ठंडा दार्शनिक अमूर्तन नहीं; यह उस आत्मा की प्रेमपूर्ण पूजा में खिलता है। उल्लेखनीय आश्वासन: 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' — ऐसा योगी कैसे भी रहे, वह मुझमें रहता है। शंकराचार्य 'सर्वथा' (हर तरह से) पर बल देते हैं।

भगवद्गीता 6.31 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यहाँ मुक्तिदायक हिस्सा है: एक बार जब तुम सब प्राणियों में दिव्य को सच में देखते हो और उस प्रेमपूर्ण पहचान के साथ जीते हो, तुम उस सम्बन्ध में रहते हो चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो। 'आध्यात्मिक समय' और 'सामान्य समय' के बीच कोई अलगाव नहीं। चाहे तुम काम कर रहे हो, खा रहे हो, या आराम कर रहे हो, सम्बन्ध बना रहता है — क्योंकि यह तुम्हारे देखने के तरीके में जड़ा है। जब दृष्टि वास्तविक है, सारा जीवन अभ्यास बन जाता है।

भगवद्गीता 6.31 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

यहाँ फ्रीइंग हिस्सा है: एक बार जब तुम सब बीइंग्स में डिवाइन को सच में देखते हो और उस लविंग रिकग्निशन के साथ जीते हो, तुम कनेक्टेड रहते हो चाहे कुछ भी कर रहे हो। 'स्पिरिचुअल टाइम' और 'नॉर्मल लाइफ' के बीच कोई स्प्लिट नहीं। चाहे तुम काम कर रहे हो, खा रहे हो, या चिल कर रहे हो — कनेक्शन होल्ड करता है। जब विज़न रियल है, तुम्हारी पूरी लाइफ ही प्रैक्टिस है।

भगवद्गीता 6.31 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत साझा करते हैं: एक योगी जो सब प्राणियों के अंदर एक भगवान को देखता है, और प्यार से उसका सम्मान करता है — वह चाहे कुछ भी कर रहा हो भगवान से जुड़ा रहता है! चाहे वे खेल रहे हों, खा रहे हों, पढ़ रहे हों, या आराम कर रहे हों, वे हमेशा दिव्य के करीब हैं। तुम्हें भगवान के साथ रहने के लिए किसी विशेष जगह चुपचाप बैठने की ज़रूरत नहीं!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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