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अध्याय 6 · श्लोक 28आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 28 / 47

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥

लिप्यंतरण

yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī vigata-kalmaṣhaḥ sukhena brahma-sansparśham atyantaṁ sukham aśhnute

शब्दार्थ (अन्वय)

yuñjan
uniting (the self with God)
evam
thus
sadā
always
ātmānam
the self
yogī
a yogi
vigata
freed from
kalmaṣhaḥ
sins
sukhena
easily
brahma-sansparśham
constantly in touch with the Supreme
atyantam
the highest
sukham
bliss
aśhnute
attains

भावार्थ

इस प्रकार अपने-आपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या

"युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः, सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।" — इस प्रकार सदा आत्मा को युक्त करते हुए, निष्कलंक योगी सरलता से ब्रह्म के स्पर्श का अनंत सुख भोगता है। श्रीकृष्ण ध्यान खंड के फलों का वर्णन (6.27-28) एक श्लोक से समाप्त करते हैं जो 6.15 की प्रतिध्वनि करता है। 'युञ्जन्नेवं सदा' — इस प्रकार सदा आत्मा को युक्त करते हुए: फिर निरंतरता पर बल। 'विगतकल्मषः' बना योगी परम पुरस्कार प्राप्त करता है। पुरस्कार सुंदर घनिष्ठता से वर्णित है: 'ब्रह्मसंस्पर्शम् अत्यन्तं सुखम्' — 'संस्पर्श,' ब्रह्म के स्पर्श से आने वाला अनंत सुख। 'संस्पर्श' (स्पर्श, सम्पर्क) शब्द कोमल और प्रत्यक्ष है। और 'सुखेन' शब्द पर ध्यान दो — सरलता से। शंकराचार्य इसे उजागर करते हैं: एक बार मन शुद्ध और अभ्यास स्थापित हो जाने पर, यह परम आनंद 'सरलता से' आता है, बिना तनाव।

भगवद्गीता 6.28 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

अभ्यास की पराकाष्ठा केवल शांति नहीं — यह अनंत का एक घनिष्ठ 'स्पर्श' है, असीम खुशी के रूप में वर्णित। और आश्वस्त करने वाले शब्द पर ध्यान दो: 'सरलता से।' एक बार जब तुमने मन को शुद्ध और स्थिर करने का धैर्यपूर्ण कार्य कर लिया, सबसे गहरा आनंद अधिक तनाव नहीं माँगता — यह स्वाभाविक रूप से बहता है। यह किसी भी क्षेत्र में महारत का सच है: शुरुआती चरण मेहनती हैं, पर अंततः जो कठिन था वह सहज हो जाता है।

भगवद्गीता 6.28 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

प्रैक्टिस का पेऑफ सिर्फ 'काम' नहीं — यह इन्फिनिट का एक इंटिमेट टच है, असीम हैप्पीनेस के रूप में। और रीअश्योरिंग वर्ड कैच करो: 'easily.' एक बार जब तुमने माइंड को प्योरिफाई और स्टेडी करने का पेशेंट वर्क कर लिया, डीपेस्ट ब्लिस और ग्राइंडिंग नहीं माँगती — यह बस फ्लो करती है। डिसिप्लिन डेस्टिनेशन नहीं; यह ब्रिज है। पेशेंटली वॉक करो।

भगवद्गीता 6.28 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण ध्यान का अंतिम, अद्भुत पुरस्कार साझा करते हैं: शुद्ध-हृदय योगी अनंत ब्रह्म को 'स्पर्श' करता है और अंतहीन, असीम खुशी महसूस करता है! और सबसे अच्छा हिस्सा — एक बार जब तुमने धैर्य से अभ्यास कर लिया और तुम्हारा हृदय स्वच्छ है, यह अद्भुत आनंद आसानी से आता है, बिना किसी संघर्ष! कड़ी मेहनत बस रास्ता साफ करना था!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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