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अध्याय 6 · श्लोक 15आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 15 / 47

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥

लिप्यंतरण

yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī niyata-mānasaḥ śhantiṁ nirvāṇa-paramāṁ mat-sansthām adhigachchhati

शब्दार्थ (अन्वय)

yuñjan
keeping the mind absorbed in God
evam
thus
sadā
constantly
ātmānam
the mind
yogī
a yogi
niyata-mānasaḥ
one with a disciplined mind
śhāntim
peace
nirvāṇa
liberation from the material bondage
paramām
supreme
mat-sansthām
abides in me
adhigachchhati
attains

भावार्थ

नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या

"युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः, शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।" — इस प्रकार सदा मन को युक्त करते हुए, नियत मन वाला योगी निर्वाण-परम शान्ति प्राप्त करता है, जो मुझमें स्थित है। श्रीकृष्ण 6.10-14 में वर्णित ध्यान-साधना का फल बताते हैं। 'युञ्जन्नेवं सदा' — इस प्रकार निरंतर मन को (आत्मा के साथ) युक्त करते हुए: परिणाम निरंतर, नियमित अभ्यास से आता है। 'नियतमानसः' — अनुशासित मन से। प्राप्ति है 'शान्तिं निर्वाणपरमाम्' — निर्वाण में पराकाष्ठा पाने वाली शान्ति। शंकराचार्य निर्वाण को यहाँ अलगाव और पीड़ा के भाव के पूर्ण शमन के रूप में समझाते हैं। महत्त्वपूर्ण रूप से, यह शान्ति 'मत्संस्थाम्' है — मुझमें स्थित। निर्वाण की शान्ति और प्रभु में स्थिति एक ही प्रस्तुत हैं।

भगवद्गीता 6.15 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि अनुशासित पथ वास्तव में कहीं पहुँचता है। नियमित, निरंतर अभ्यास — कभी-कभार के विस्फोट नहीं — एक शान्ति की ओर ले जाता है जिसे वे 'निर्वाण' कहते हैं: लालसा और उत्तेजना के आंतरिक बुखारों का ठंडा होना। यह वादा किसी के लिए मायने रखता है जो सोचता है कि क्या अभ्यास की दैनिक मेहनत 'इसके लायक' है। है। निरंतरता मुख्य शब्द है।

भगवद्गीता 6.15 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण बेसिकली कहते हैं: हाँ, यह डिसिप्लिन्ड पथ वास्तव में कहीं जाता है। कंसिस्टेंट प्रैक्टिस — रैंडम बर्स्ट्स नहीं जब तुम्हें फील हो — एक शान्ति की ओर ले जाती है जिसे वे 'निर्वाण' कहते हैं: उस सब इनर क्रेविंग-एंड-एजिटेशन फीवर का ठंडा होना। यह एम्प्टीनेस नहीं; यह डीपेस्ट काम है। कीवर्ड कंसिस्टेंसी है।

भगवद्गीता 6.15 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत वादा करते हैं: अगर तुम स्थिर मन से नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करते हो, तुम सबसे गहरी, सबसे सुंदर शान्ति पाओगे — इतनी पूर्ण शान्ति कि इसे 'निर्वाण' कहते हैं, जहाँ तुम्हारी सब चिंताएँ ठंडी होकर पिघल जाती हैं! और यह शान्ति भगवान में विश्राम करने से मिलती है। तो हर दिन अभ्यास करना सच में कहीं अद्भुत ले जाता है!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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