अध्याय 6 · श्लोक 24— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥
लिप्यंतरण
saṅkalpa-prabhavān kāmāns tyaktvā sarvān aśheṣhataḥ manasaivendriya-grāmaṁ viniyamya samantataḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- saṅkalpa
- — a resolve
- prabhavān
- — born of
- kāmān
- — desires
- tyaktvā
- — having abandoned
- sarvān
- — all
- aśheṣhataḥ
- — completely
- manasā
- — through the mind
- eva
- — certainly
- indriya-grāmam
- — the group of senses
- viniyamya
- — restraining
- samantataḥ
- — from all sides
भावार्थ
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रिय-समूहको सभी ओरसे हटाकर।
व्याख्या
"संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः, मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः।" — संकल्प से उत्पन्न सब इच्छाओं को पूर्णतः त्यागकर, मन से ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से संयमित करके। योग की परिभाषा और अभ्यास का दृष्टिकोण देने के बाद (6.23), श्रीकृष्ण अब वह विधि वर्णित करते हैं जिससे मन स्थिरता में लाया जाता है। पहला: 'संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः' — संकल्प (स्वार्थी मानसिक प्रक्षेपण) से उत्पन्न सब इच्छाओं को, पूर्णतः और बिना शेष त्यागकर। यह 6.2 और 6.4 की प्रतिध्वनि है: हर बाँधने वाली इच्छा की जड़ में संकल्प है। दूसरा: 'मनसैव इन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः' — मन से ही, इन्द्रियों के पूरे समूह को हर ओर से संयमित करके। शंकराचार्य 'मनसैव' (मन से ही) वाक्यांश पर ध्यान देते हैं: इन्द्रियाँ बाहरी बल से नहीं बल्कि प्रशिक्षित मन से शासित होती हैं।
भगवद्गीता 6.24 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण बेचैन मन को वश में करने का व्यावहारिक क्रम देते हैं। चरण एक: 'संकल्प' से उत्पन्न इच्छाएँ छोड़ो — मन की चाहने वाली चीज़ें कल्पना और प्रक्षेपित करने की बाध्यकारी आदत। उस प्रक्षेपण को जड़ से काटो और उससे बढ़ती लालसाएँ अपने आप सूख जाती हैं। चरण दो: इन्द्रियों को 'मन से ही' नियंत्रित करो — कठोर बाहरी बल से नहीं, बल्कि अब-शांत मन से। क्रम मायने रखता है: पहले इच्छा-इंजन को शांत करो, फिर इन्द्रियाँ अनुसरण करती हैं।
भगवद्गीता 6.24 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण बेचैन माइंड को टेम करने का असली सीक्वेंस देते हैं। स्टेप 1: 'संकल्प' से जनरेटेड डिज़ायर्स ड्रॉप करो — चाहने वाली चीज़ें इमेजिन और प्रोजेक्ट करने की तुम्हारे माइंड की कम्पल्सिव हैबिट। उसे रूट से काटो, और उससे बढ़ती क्रेविंग्स खुद विदर हो जाती हैं। स्टेप 2: इन्द्रियों को 'मन से ही' रीन इन करो। ऑर्डर सीक्रेट है: पहले डिज़ायर-इंजन शांत करो।
भगवद्गीता 6.24 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण व्यस्त मन को शांत करने का सही तरीका सिखाते हैं, दो चरणों में! पहला: तुम्हारी कल्पना में आने वाली सब लालची 'मैं यह चाहता हूँ, मैं वह चाहता हूँ!' इच्छाएँ छोड़ो — उन सबको धीरे से रख दो। दूसरा: एक बार जब तुम्हारा मन शांत हो, उस शांत मन का उपयोग अपनी इन्द्रियों को हर मज़ेदार चीज़ का पीछा करने से धीरे से वापस लाने के लिए करो। तरकीब क्रम है — पहले इच्छा शांत करो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
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