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अध्याय 6 · श्लोक 23आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 23 / 47

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥

लिप्यंतरण

taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā

शब्दार्थ (अन्वय)

tam
that
vidyāt
you should know
duḥkha-sanyoga-viyogam
state of severance from union with misery
yoga-saṁjñitam
is known as yog
saḥ
that
niśhchayena
resolutely
yoktavyaḥ
should be practiced
yogaḥ
yog
anirviṇṇa-chetasā
with an undeviating mind

भावार्थ

जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।

व्याख्या

"तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्, स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।" — दुःख के संयोग से वियोग को योग जानो। इस योग का अभ्यास निश्चय और अखिन्न मन से करना चाहिए। श्रीकृष्ण समाधि-समूह (6.20-23) का समापन योग की परिभाषा और दृष्टिकोण पर एक महत्त्वपूर्ण निर्देश देकर करते हैं। परिभाषा: योग 'दुःखसंयोगवियोगम्' है — दुःख के साथ संयोग का वियोग। यह एक गहन सूत्रीकरण है। हमारी पीड़ा दुःख के स्रोतों के साथ हमारे 'संयोग' से उठती है। फिर श्लोक का व्यावहारिक हृदय: 'स निश्चयेन योक्तव्यः ... अनिर्विण्णचेतसा' — इस योग का अभ्यास दृढ़ संकल्प (निश्चय) और अखिन्न, निराश न होने वाले मन से करना चाहिए। शंकराचार्य इसे आवश्यक परामर्श के रूप में उजागर करते हैं। पथ लम्बा है; असफलताएँ अवश्यम्भावी हैं।

भगवद्गीता 6.23 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण योग को सरलता से परिभाषित करते हैं: यह दुःख के साथ तुम्हारे संयोग से वियोग है। तुम्हारा दर्द नश्वर चीज़ों, अहंकार और लालसाओं के साथ उलझे होने से आता है; योग उस बाँधने वाली डोर को काटना है। पर यहाँ असली सोना दृष्टिकोण-निर्देश है: दृढ़ संकल्प और अखिन्न मन से अभ्यास करो। यह सब कुछ है। हर सार्थक अभ्यास में सूखे दौर और पठार होते हैं। श्रीकृष्ण का परामर्श: हतोत्साह की अपेक्षा करो, इसे रुकने मत दो।

भगवद्गीता 6.23 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण योग को एक लाइन में परिभाषित करते हैं: सफरिंग के साथ अपने यूनियन से डिस्कनेक्ट होना। तुम्हारा पेन पेरिशेबल स्टफ, ईगो, क्रेविंग्स के साथ टैंगल होने से आता है — योग वह कॉर्ड काटता है। पर रियल जेम एटीट्यूड एडवाइस है: डिटरमिनेशन और अनडिस्करेज्ड माइंड से प्रैक्टिस करो। यही पूरा गेम है। हर मीनिंगफुल प्रैक्टिस में ड्राई स्पेल्स होते हैं। वहीं ज़्यादातर लोग क्विट करते हैं।

भगवद्गीता 6.23 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि योग वास्तव में क्या है: दुःख और पीड़ा से चिपके होने से मुक्त होना! और वे बहुत महत्त्वपूर्ण सलाह देते हैं: मज़बूत संकल्प से अभ्यास करो और कभी हतोत्साहित मत हो। कुछ भी अद्भुत सीखने में — जैसे कोई वाद्य या खेल — कठिन दिन होते हैं जब तुम सुधरते नहीं दिखते। श्रीकृष्ण कहते हैं: हार मत मानो! एक खुशमिज़ाज, दृढ़ हृदय से चलते रहो!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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