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अध्याय 6 · श्लोक 2आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 2 / 47

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥

लिप्यंतरण

yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava na hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana

शब्दार्थ (अन्वय)

yam
what
sanyāsam
renunciation
iti
thus
prāhuḥ
they say
yogam
yog
tam
that
viddhi
know
pāṇḍava
Arjun, the son of Pandu
na
not
hi
certainly
asannyasta
without giving up
saṅkalpaḥ
desire
yogī
a yogi
bhavati
becomes
kaśhchana
anyone

भावार्थ

हे अर्जुन ! लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता।

व्याख्या

"यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव, न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।" — जिसे संन्यास कहते हैं उसी को योग जानो, हे पाण्डव; क्योंकि संकल्प का त्याग किए बिना कोई योगी नहीं बनता। श्रीकृष्ण संन्यास और योग को स्पष्ट रूप से एक बताते हैं: ये दो प्रतिस्पर्धी पथ नहीं बल्कि एक ही वास्तविकता दो कोणों से देखी गई है। संन्यास आंतरिक त्याग है; योग वह अनुशासित मिलन है जिसे यह त्याग सम्भव बनाता है। इनके बीच का सेतु है 'संकल्प' — स्वार्थी संकल्प, अहंकार की इच्छा-परियोजनाएँ। शंकराचार्य संकल्प को मन की उन कल्पनाओं के रूप में समझाते हैं जो इच्छा को ईंधन देती हैं: 'मैं यह चाहता हूँ, मैं वह पाऊँगा' की निरंतर आंतरिक योजना। इन स्व-केन्द्रित संकल्पों से प्रेरित रहते हुए कोई योगी नहीं बनता। यह एक सटीक निदान है। यह बंधन को कर्मों या सम्पत्ति में नहीं बल्कि इच्छा-प्रक्षेपण की सूक्ष्म आंतरिक गतिविधि में स्थित करता है।

भगवद्गीता 6.2 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

आंतरिक स्वतंत्रता की सबसे गहरी बाधा तुम्हारी परिस्थितियाँ नहीं हैं — यह 'मैं चाहता हूँ, मैं पाऊँगा, मुझे चाहिए' की निरंतर मानसिक बकबक है। श्रीकृष्ण इसे संकल्प कहते हैं। वास्तविक अर्थ में संन्यास का मतलब इस बाध्यकारी इच्छा-मशीनरी को ढीला करना है, अपना पता या पद बदलना नहीं। यह मुक्तिदायक है: तुम्हें शुरू करने के लिए पूर्ण बाहरी व्यवस्था का इंतज़ार नहीं करना।

भगवद्गीता 6.2 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

त्याग और योग? एक ही चीज़, अलग एंगल। और असली चीज़ जो तुम त्यागते हो वह तुम्हारा सामान नहीं — यह 'संकल्प' है, चाहने, प्लानिंग, जो तुम चाहते हो उसके लिए स्कीमिंग का नॉनस्टॉप इनर लूप। जब तक वह लूप शो चलाता है तुम योगी नहीं हो सकते। गुड न्यूज़: काम 'अपनी ज़िंदगी छोड़ो' नहीं। यह उस क्रेविंग-फीड को नोटिस करना और उसे ड्राइव न करने देना है।

भगवद्गीता 6.2 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कहते हैं संन्यास और योग वास्तव में एक ही चीज़ हैं! और असली चीज़ जो हम 'छोड़ते' हैं वह हमारे खिलौने या खेल नहीं — यह हमारे सिर के अंदर का निरंतर 'मैं यह चाहता हूँ, मैं वह चाहता हूँ' सोचना है। जब हम लालची इच्छाओं को अपने ऊपर हुकूमत नहीं करने देते, हम सच्चे योगी बनने लगते हैं।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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