अध्याय 5 · श्लोक 3— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
लिप्यंतरण
jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate
शब्दार्थ (अन्वय)
- jñeyaḥ
- — should be considered
- saḥ
- — that person
- nitya
- — always
- sanyāsī
- — practising renunciation
- yaḥ
- — who
- na
- — never
- dveṣhṭi
- — hate
- na
- — nor
- kāṅkṣhati
- — desire
- nirdvandvaḥ
- — free from all dualities
- hi
- — certainly
- mahā-bāho
- — mighty-armed one
- sukham
- — easily
- bandhāt
- — from bondage
- pramuchyate
- — is liberated
भावार्थ
हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
व्याख्या
"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति, निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।" — जो न घृणा करता है न चाहता है उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए; द्वन्द्वों से मुक्त, हे महाबाहु, वह सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक संन्यास की गीता की पुनर्परिभाषा है। वास्तविक संन्यासी की पहचान उसके वस्त्र, निवास-स्थान या गतिविधियों से नहीं — बल्कि उनके अभिविन्यास की आंतरिक गुणवत्ता से: न घृणा न इच्छा। 'नित्यसंन्यासी' — नित्य संन्यासी — महत्त्वपूर्ण है: यह कोई चरण या भूमिका नहीं जो व्यक्ति अपनाता है बल्कि द्वंद्वों के उस धक्का-खिंचाव से मुक्त होने की आंतरिक अवस्था है। शंकराचार्य बताते हैं कि जो द्वंद्व (द्वन्द्व) पार किया जा रहा है वह विशेष रूप से आकर्षण और घृणा का जोड़ा है। जब ये गतिविधियाँ शांत होती हैं, व्यक्ति संलग्न और सक्रिय रहता है पर वह प्रतिक्रियात्मक रंग के बिना जो कर्म बनाता है। यह श्लोक साधकों के लिए महत्त्वपूर्ण है: गीता कह रही है कि द्वेष और काँक्षा का आंतरिक संन्यास किसी भी बाहरी संन्यास से अधिक निश्चायक है।
भगवद्गीता 5.3 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
वास्तविक संन्यासी की परिभाषा का वस्त्र या मठों से कोई लेना-देना नहीं है। यह न चाहने और न घृणा करने की आंतरिक अवस्था है — न जो चाहते हो उसकी ओर खिंचे न जो नहीं चाहते उसे धकेलते। यह उसकी अवस्था है जिसकी धारणा इच्छा और घृणा द्वारा व्यवस्थित रूप से विकृत नहीं है। उस अवस्था में, कर्म वास्तविकता के सटीक प्रतिसाद बन जाते हैं। और मुक्ति 'सुखम्' से आती है — दाँत पीसने से नहीं बल्कि उस प्राकृतिक हल्कापन से जो पकड़ छूटने पर आता है।
भगवद्गीता 5.3 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
असली त्याग कपड़ों या लोकेशन के बारे में नहीं है — यह इनर स्टेट के बारे में है। नित्य संन्यासी वह है जो न चाहता है न घृणा करता है। जो कुछ नहीं चाहता (टॉक्सिक डिटैचमेंट) नहीं, बल्कि जो वांटिंग और नॉट-वांटिंग द्वारा सिस्टेमेटिकली कंट्रोल्ड नहीं है। तभी परसेप्शन क्लियर होती है और एक्शन्स एक्यूरेट बनते हैं।
भगवद्गीता 5.3 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण एक आश्चर्यजनक उत्तर देते हैं: वास्तविक संन्यासी वह है जो चीज़ों की दृढ़ता से इच्छा नहीं करता NOR घृणा नहीं करता — चाहे कहीं भी रहे! वह साधु जो अभी भी इच्छा करता और घृणा करता है, उस कामकाजी व्यक्ति से कम मुक्त है जिसने आंतरिक शांति पाई है।
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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