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अध्याय 5 · श्लोक 4कर्म संन्यास योग

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श्लोक 4 / 29

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥

लिप्यंतरण

sānkhya-yogau pṛithag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ ekamapyāsthitaḥ samyag ubhayor vindate phalam

शब्दार्थ (अन्वय)

sānkhya
renunciation of actions
yogau
karm yog
pṛithak
different
bālāḥ
the ignorant
pravadanti
say
na
never
paṇḍitāḥ
the learned
ekam
in one
api
even
āsthitaḥ
being situated
samyak
completely
ubhayoḥ
of both
vindate
achieve
phalam
the result

भावार्थ

बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

व्याख्या

"सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः, एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।" — केवल बालक, न पंडित, सांख्य और योग को अलग बताते हैं; किसी एक में भी सम्यक् रूप से स्थित व्यक्ति दोनों का फल पाता है। यहाँ सांख्य ज्ञान और संन्यास के पथ (ज्ञान-संन्यास) को संदर्भित करता है। योग कर्म योग को — अनुशासित, अनासक्त कर्म का पथ। श्रीकृष्ण का बिंदु है कि उनके बीच का स्पष्ट विरोध केवल रूप के स्तर पर है, अंतिम परिणाम के नहीं। दोनों पथ, जब पूर्णतः पालन किए जाते हैं, उसी पहचान की ओर ले जाते हैं: कि आत्मा सदा-मुक्त है, कि अहंकार-दावेदार के बिना कर्म कोई कार्मिक निशान नहीं छोड़ता। एक सिद्ध कर्म योगी और सिद्ध ज्ञान संन्यासी उसी समझ पर पहुँचते हैं। शंकराचार्य बताते हैं कि 'सम्यक्' (सम्यग्, पूर्णतः) शब्द महत्त्वपूर्ण है: 'सम्यक् स्थित' का अर्थ है पूर्ण प्रतिबद्धता और गहराई के साथ पथ का पालन, सतही परिचय नहीं।

भगवद्गीता 5.4 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यह बहस कि कौन सा आध्यात्मिक पथ 'बेहतर' है — ज्ञान, भक्ति, कर्म योग या अन्य — अक्सर इस बात को नजरअंदाज करती है: अपनी पूर्ण गहराई पर, वे उसी पहचान पर पहुँचते हैं। अलग-अलग नदियाँ, एक ही सागर। भेद उस शुरुआती बिंदु को चुनने के लिए मायने रखते हैं जो किसी के स्वभाव के अनुकूल हो। यह उन लोगों को राहत देता है जो महसूस करते हैं कि उन्हें प्रेमपूर्ण भक्ति, कठोर जिज्ञासा और सक्रिय सेवा के बीच चुनना है।

भगवद्गीता 5.4 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

कौन सा स्पिरिचुअल पाथ 'बेहतर' है — मेडिटेशन, सर्विस, डिवोशन, फिलॉसफी — यह बेसिकली बिगिनर्स की बहस है। गहराई पर, सब कन्वर्ज करते हैं। अलग-अलग टेम्पेरामेंट्स के लिए अलग स्टार्टिंग पॉइंट्स, एक ही डेस्टिनेशन। जो तुम्हारे साथ रेज़ोनेट करे उसमें डीप जाओ।

भगवद्गीता 5.4 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कहते हैं बुद्धिमान जानते हैं कि दो अलग रास्ते उसी अद्भुत स्थान तक ले जा सकते हैं! सावधानी से सोचने का पथ (सांख्य) और बुद्धिमानी से कार्य करने का पथ (योग) दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं। एक ही पहाड़ पर दो अलग रास्तों जैसे — तुम दोनों तरफ से शीर्ष पर पहुँचोगे।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

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