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अध्याय 5 · श्लोक 14कर्म संन्यास योग

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गीता 5.14 गहराई में काम करते हाथ को बताती है: दिव्यता न कर्तृत्व रचती है, न कर्म, न कर्म-फल का संयोग — वह स्वभाव से ही उठता है। 'मैंने किया' सा लगने के नीचे प्रकृति की अपनी धाराएँ बहती हैं।

श्लोक 14 / 29

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥

लिप्यंतरण

na kartṛitvaṁ na karmāṇi lokasya sṛijati prabhuḥ na karma-phala-saṅyogaṁ svabhāvas tu pravartate

शब्दार्थ (अन्वय)

na
neither
kartṛitvam
sense of doership
na
nor
karmāṇi
actions
lokasya
of the people
sṛijati
creates
prabhuḥ
God
na
nor
karma-phala
fruits of actions
sanyogam
connection
svabhāvaḥ
one’s nature
tu
but
pravartate
is enacted

भावार्थ

परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।

व्याख्या

"न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः, न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।" — प्रभु न तो लोगों के कर्तृत्व की भावना बनाता है, न कर्म, न कर्म-फल-संयोग; स्वभाव ही प्रवर्तित होता है। यह श्लोक आत्मा के बारे में एक सटीक दार्शनिक दावा करता है (यहाँ 'प्रभुः' कहा — भीतर का अधिपति)। आत्मा न तो कर्तृत्व — कर्ता-भाव — बनाता है, न कर्म, न कर्म-फल-संयोग। 'स्वभाव' — अपनी प्रकृति, संस्कारी आदिम प्रकृति — ही प्रवर्तित होती है। शंकराचार्य और गीता प्रेस टीका दोनों बताते हैं कि यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी का विरोध करती लग सकती है — अगर भीतर का प्रभु कुछ नहीं बनाता, जिम्मेदारी कहाँ है? उत्तर: अहंकार-स्व, प्रकृति के वाहनों के माध्यम से, कर्ता-भाव का झूठा बोध बनाता है। आत्मा शुद्ध साक्षी उपस्थिति है।

भगवद्गीता 5.14 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यह श्लोक जिम्मेदारी को समझने के तरीके में बदलाव की ओर इशारा करता है। पारम्परिक दृष्टि: 'मैं कर्ता हूँ; मैं चुनाव करता हूँ।' योगिक दृष्टि: शरीर-मन संकुल, अपनी प्रकृति और पिछले संस्कारों से संस्कारित, कर्म और उनके परिणाम उत्पन्न करता है; आत्मा देखती है। यह नैतिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं करता — यह इसे पुनः स्थापित करता है। संस्कारित स्व अपने संस्कार परिष्कृत करने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। पर आत्मा सदा मुक्त थी।

भगवद्गीता 5.14 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

हेवी श्लोक: आत्मा (असली स्व, भीतर का प्रभु) न 'मैंने यह किया' की भावना बनाता है, न कर्म, न कर्म-फल-बाइंडिंग। स्वभाव — संस्कार, पिछले इम्प्रेशन, गुण — शो चलाता है। स्व बस साक्षी। जिम्मेदारी अभी भी है, पर वह संस्कारित स्व की है अपना संस्कार परिष्कृत करने के लिए — आत्मा की नहीं, जो सदा मुक्त थी।

भगवद्गीता 5.14 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ गहरा कहते हैं: तुम्हारे अंदर असली 'तुम' — तुम्हारी आत्मा — वास्तव में 'मैंने किया' की भावनाएँ, तुम्हारे कर्म, या उनके परिणाम नहीं बनाती। वे तुम्हारी प्रकृति और आदतों से आते हैं। तुम्हारी आत्मा बस सब देखती है, शुद्ध और मुक्त! यह कमरे की रोशनी की तरह है — रोशनी बस सब को प्रकाशित करती है पर उसने फर्नीचर नहीं बनाया।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 5.14 का अर्थ क्या है?

दिव्यता न कर्तृत्व रचती है, न कर्म, न कर्म-फल का संयोग; वह स्वभाव से उठता है। 'मैंने किया' सा लगने के नीचे प्रकृति की अपनी धाराएँ बहती हैं।

यह श्लोक किसने कहा?

भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, पाँचवें अध्याय (कर्म संन्यास योग) में, व्यक्तिगत कर्तृत्व के भ्रम से परे इशारा करते हुए।

गीता 5.14 आज के जीवन में कैसे उतारें?

शुद्ध 'मैं' चुनने सा लगता क्षण भी प्रकृति की शक्तियों से गहराई से गढ़ा होता है। यह पहचानना अहंकार के कर्ता-दावे को कोमलता से सिकोड़ता है।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

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प्रामाणिक स्रोत

ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।