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अध्याय 18 · श्लोक 16मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 16 / 78

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥

लिप्यंतरण

tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ paśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

tatra
there
evam sati
in spite of this
kartāram
the doer
ātmānam
the soul
kevalam
only
tu
but
yaḥ
who
paśhyati
see
akṛita-buddhitvāt
with impure intellect
na
not
saḥ
they
paśhyati
see
durmatiḥ
foolish

भावार्थ

परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण त्रुटि नाम करते हैं: 'ऐसा होते हुए भी, जो अप्रशिक्षित मन के कारण शुद्ध स्व को अकेले कर्ता देखता है — वह विकृत समझ का मूर्ख सच में नहीं देखता।' श्रीकृष्ण अहं-भ्रम पहचानते हैं। शंकराचार्य सटीक त्रुटि समझाते हैं। 'अप्रशिक्षित' (अकृत-बुद्धि) व्यक्ति — जिसका विवेक परिष्कृत नहीं — केवल स्व को (अहं-स्व मिश्रण) कर्ता देखता है, अन्य चार कारकों को अनदेखा करते। यह 'दुर्मति' है। मुख्य शब्द 'केवलम्' है: त्रुटि कर्ता-कारक को स्वीकार करना नहीं, बल्कि इसे एकमात्र कारक देखना है। प्रशिक्षित मन कर्ता को पाँच में से एक देखता है; अप्रशिक्षित मन इसे सब में फुलाता है। 'अकृत-बुद्धि' सुझाता है कि यह मुख्यतः नैतिक विफलता नहीं बल्कि प्रशिक्षण की कमी है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि निदान है कि 'मैंने अकेले यह किया' का अहं-भ्रम द्वेष या स्वार्थ नहीं, बल्कि 'अप्रशिक्षित समझ' के रूप में वर्णित है — एक विवेक जो बस अभी परिष्कृत नहीं हुआ। यह उदार और सटीक है। समस्या यह नहीं कि तुम बुरे व्यक्ति हो; यह है कि तुम्हारा देखना पूरी तस्वीर नोटिस करने के लिए प्रशिक्षित नहीं हुआ। उपाय शर्म नहीं बल्कि परिष्करण है। सबक: खुद के और दूसरों के साथ धैर्य रखो। कई त्रुटियाँ बुरे चरित्र से नहीं बल्कि अप्रशिक्षित समझ से हैं। पथ शर्म नहीं बल्कि अपने देखने का धैर्यपूर्ण प्रशिक्षण है।

भगवद्गीता 18.16 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि उदारतापूर्वक निदानात्मक पहचान है कि 'मैंने अकेले यह किया' का अहं-भ्रम द्वेष या स्वार्थ नहीं, बल्कि 'अप्रशिक्षित समझ' (अकृत-बुद्धि) के रूप में वर्णित है — एक विवेक जो बस अभी परिष्कृत नहीं हुआ। यह फ्रेमिंग उदार और सटीक दोनों है। मौलिक समस्या यह नहीं कि तुम बुरे व्यक्ति हो; यह है कि तुम्हारा देखना वास्तव में जो हो रहा है उसकी पूरी तस्वीर नोटिस करने के लिए प्रशिक्षित नहीं हुआ। हम पाँच कारकों को स्पष्ट देखते हुए पैदा नहीं होते; हम स्वाभाविक रूप से हर चीज़ को 'मैंने वह किया' में संक्षिप्त करते हैं। यह संक्षेपण बुरा या नैतिक विफलता नहीं; यह बस अप्रशिक्षित है। और उपाय शर्म, कठोर आत्म-आलोचना नहीं, बल्कि धैर्यपूर्ण परिष्करण है। सबक: अपने और दूसरों के साथ सच में धैर्यवान रहो। कई त्रुटियाँ बुरे चरित्र से नहीं बल्कि अप्रशिक्षित समझ से हैं। पथ धैर्यपूर्ण प्रशिक्षण है।

भगवद्गीता 18.16 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट जेनरसली डायग्नोस्टिक रिकग्निशन है कि 'आई एलोन डिड दिस' का ईगो-इल्यूज़न मैलिस या सेल्फिशनेस नहीं, बल्कि 'अनट्रेन्ड अंडरस्टैंडिंग' के रूप में डिस्क्राइब्ड है — एक डिसर्नमेंट जो बस अभी रिफाइन्ड नहीं हुआ। यह फ्रेमिंग जेनरस और एक्यूरेट दोनों है। फंडामेंटल प्रॉब्लम यह नहीं कि तुम बैड पर्सन हो; यह है कि तुम्हारा सीइंग ट्रेन्ड नहीं हुआ। और रेमेडी शेम नहीं बल्कि पेशेंट रिफाइनमेंट है। सबक: खुद के और दूसरों के साथ पेशेंट रहो। कई एरर्स बैड कैरेक्टर से नहीं बल्कि अनट्रेन्ड अंडरस्टैंडिंग से हैं। पाथ रिफाइनमेंट है, फ्लैजेलेशन नहीं।

भगवद्गीता 18.16 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक बहुत महत्त्वपूर्ण और दयालु विचार समझाते हैं: जब कोई सोचता है 'मैंने यह सब अकेले किया!' (अन्य चार कारकों को अनदेखा करते), श्रीकृष्ण उन्हें बुरा नहीं बल्कि 'अप्रशिक्षित' कहते हैं! मतलब: वे बस अभी स्पष्ट देखना नहीं सीखे! यहाँ अद्भुत, दयालु विचार है: जब हम सोचने की गलती करते हैं कि हमने सब अकेले किया, यह इसलिए नहीं कि हम बुरे हैं — यह इसलिए है कि हमें सब चीज़ों को साथ काम करते देखना नहीं सिखाया गया! एक बच्चा जो पढ़ना नहीं सीखा बुरा बच्चा नहीं — बस अभी प्रशिक्षित नहीं हुआ! और बढ़ने का तरीका इसके बारे में शर्म महसूस करना नहीं — स्पष्ट देखने का अभ्यास करना है! तो जब तुम (या कोई और!) सोचने की गलती करो 'मैंने यह सब अकेले किया' — कठोर मत बनो! यह बस अप्रशिक्षित देखना है। धैर्य रखो, अपने देखने को प्रशिक्षित करो!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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